दैनिक भास्कर के गोरखपुर स्टिंग ऑपरेशन के संदर्भ में "हलाला" की वास्तविक इस्लामी हकीकत
क़ुरआन, हदीस, इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय कानून की रोशनी में एक शोधपरक लेख:
हाल ही में हिंदी के प्रसिद्ध समाचार पत्र "दैनिक भास्कर" ने गोरखपुर में एक स्टिंग ऑपरेशन प्रकाशित किया, जिसमें दावा किया गया कि कुछ लोगों ने "हलाला" के नाम पर पैसे लेकर निकाह और तलाक को एक कारोबार का रूप दे दिया है। यदि इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोप निष्पक्ष जांच और न्यायालय की प्रक्रिया के बाद सही सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल भारतीय कानून का उल्लंघन होगा, बल्कि इस्लाम की मूल शिक्षाओं और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की हिदायतों के भी विरुद्ध होगा।
दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे मामलों के बाद कुछ लोग यह समझने लगते हैं कि शायद इस्लाम ही इस प्रकार के "कारोबारी हलाला" की अनुमति देता है, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। इस्लाम में निकाह एक पवित्र अनुबंध (Sacred Contract) है, कोई व्यापार या अस्थायी व्यवस्था नहीं। इसी प्रकार तलाक एक अत्यंत नापसंद लेकिन कुछ परिस्थितियों में अंतिम उपाय है, न कि खेल या कमाई का साधन।
इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में निर्णय देना नहीं, बल्कि पवित्र क़ुरआन, सही हदीस, इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय कानून की रोशनी में यह स्पष्ट करना है कि इस्लाम का वास्तविक आदेश क्या है, ताकि मुसलमान और गैर-मुस्लिम दोनों सत्य को समझ सकें।
हलाला क्या है?
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस्लाम में "हलाला" नाम की कोई स्वतंत्र धार्मिक रस्म, इबादत या व्यवसाय नहीं है। मूल विषय तीन तलाक (तलाक-ए-मुग़ल्लज़ा) के बाद पुनः विवाह का है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है—
> "फिर यदि वह (तीसरी बार) तलाक दे दे, तो वह स्त्री उसके लिए तब तक वैध नहीं होगी, जब तक वह किसी दूसरे पुरुष से निकाह न कर ले। फिर यदि दूसरा पति भी उसे तलाक दे दे, तो दोनों के लिए पुनः निकाह करने में कोई दोष नहीं, यदि उन्हें विश्वास हो कि वे अल्लाह की निर्धारित सीमाओं का पालन करेंगे।"
(सूरह अल-बक़रह : 230)
इस आयत से स्पष्ट है कि दूसरा निकाह वास्तविक, स्थायी और वैवाहिक जीवन बिताने की नीयत से होना चाहिए, न कि पहले पति तक पहुँचाने के लिए पहले से बनाई गई योजना के तहत।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की स्पष्ट शिक्षा
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (رضی اللہ عنہ ) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया—
"अल्लाह ने हलाला करने वाले और जिसके लिए हलाला किया जाए, दोनों पर लानत फरमाई है।"
(सुनन अबू दाऊद : 2076, जामे तिर्मिज़ी : 1120, इब्न माजा : 1936)
यह हदीस स्पष्ट करती है कि पहले से तय करके, शर्त लगाकर या पैसे लेकर किया जाने वाला तथाकथित "हलाला" इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध है।
खलीफ़ा-ए-दोम हज़रत उमर फ़ारूक़ (رضی اللہ عنہ) ने भी फ़रमाया—
> "यदि मेरे सामने हलाला करने वाला और जिसके लिए हलाला किया गया हो, दोनों लाए जाएँ, तो मैं दोनों को दंड दूँगा।"
(मुसन्नफ़ अब्दुर्रज़्ज़ाक़, मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा)
इस्लाम पहले सुलह की शिक्षा देता है
अल्लाह तआला फ़रमाता है—
> "यदि तुम्हें पति-पत्नी के बीच विवाद का भय हो, तो एक पंच पति के परिवार से और एक पत्नी के परिवार से नियुक्त करो। यदि दोनों सुधार चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच मेल-मिलाप पैदा कर देगा।"
(सूरह अन-निसा : 35)
इससे स्पष्ट है कि इस्लाम की पहली कोशिश तलाक नहीं, बल्कि समझौता और परिवार को बचाना है।
इस्लामी फ़िक़्ह का मत:
चारों प्रसिद्ध फ़िक़्ही मत (हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई और हंबली) इस बात पर सहमत हैं कि यदि निकाह केवल इस शर्त या नीयत से किया जाए कि बाद में तलाक देकर स्त्री को पहले पति के लिए "हलाल" बनाया जाएगा, तो यह अत्यंत निंदनीय और पापपूर्ण कार्य है। इसे इस्लाम का आदर्श या पसंदीदा तरीका नहीं माना गया।
एक सरल उदाहरण:
यदि कोई व्यक्ति ग़ुस्से में अपनी पत्नी को तीन तलाक दे देता है और बाद में किसी व्यक्ति को पैसे देकर कहता है—
"आप केवल एक रात के लिए निकाह कर लीजिए और फिर तलाक दे दीजिए, ताकि मैं दोबारा उससे निकाह कर सकूँ।"
तो यह इस्लामी हलाला नहीं, बल्कि इस्लाम की दृष्टि में निंदनीय कार्य है।
लेकिन यदि वही महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी दूसरे पुरुष से स्थायी निकाह करे, वैवाहिक जीवन बिताए और बाद में किसी स्वाभाविक कारण से दूसरा विवाह समाप्त हो जाए, तब इद्दत पूरी होने के बाद पहले पति से पुनः निकाह किया जा सकता है। यही क़ुरआन का आदेश है।
यह कठोर व्यवस्था क्यों?
इस्लाम परिवार को टूटने से बचाना चाहता है। यदि तीन तलाक के बाद तुरंत वापसी की अनुमति होती, तो लोग तलाक को मज़ाक बना देते। इसलिए क़ुरआन ने कठोर व्यवस्था रखी, ताकि पति तलाक देते समय अपनी जिम्मेदारी को समझे।
भारतीय कानून:
भारत में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत एक साथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिदअत) को अपराध घोषित किया गया है। यदि हलाला के नाम पर धोखाधड़ी, ज़बरदस्ती, आर्थिक शोषण या अन्य अपराध किए जाते हैं, तो उन पर भारतीय दंड कानून भी लागू हो सकते हैं।
उलेमा की जिम्मेदारी:
उलेमा का कर्तव्य है कि वे—
तलाक से पहले हर संभव सुलह का प्रयास करें।
क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार सही मार्गदर्शन दें।
धर्म के नाम पर शोषण करने वालों का समर्थन न करें।
हलाला के नाम पर होने वाले व्यापार और धोखाधड़ी की खुलकर निंदा करें।
गैर-मुस्लिम भाइयों के लिए दो उदाहरण:
यदि कोई डॉक्टर गलत इलाज करता है, तो पूरी चिकित्सा व्यवस्था गलत नहीं हो जाती।
यदि कोई न्यायाधीश या सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान या कानून भ्रष्टाचार की अनुमति देता है।
ठीक उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति इस्लाम के नाम पर हलाला को व्यवसाय बना ले, तो यह इस्लाम की शिक्षा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का अपराध है। इस्लाम की वास्तविक शिक्षा क़ुरआन और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सही सुन्नत से समझी जाती है, न कि कुछ व्यक्तियों के गलत आचरण से।
यदि दैनिक भास्कर के गोरखपुर स्टिंग ऑपरेशन में लगा गए आरोप जांच और न्यायालय में सिद्ध हो जाते हैं, तो ऐसे कार्यों की न तो इस्लाम अनुमति देता है, न नैतिकता और न ही कानून। इस्लाम में निकाह एक पवित्र संबंध है, और हलाला के नाम पर पहले से तय किया गया या पैसे लेकर किया जाने वाला निकाह इस्लामी शिक्षाओं की भावना के विरुद्ध है।
इसलिए आवश्यक है कि समाज सनसनी, अफवाह या कुछ व्यक्तियों के गलत कार्यों के आधार पर इस्लाम का निर्णय न करे, बल्कि क़ुरआन, सही हदीस, प्रामाणिक इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय कानून की रोशनी में इस विषय को समझे।
✍️ लेखक:
मुफ्ती मुहम्मद अब्बास अल-अज़हरी
इस्लामी विद्वान एवं शिक्षक
दारुल उलूम अहले सुन्नत फ़ैज़ुन्नबी, कप्तानगंज, बस्ती (उत्तर प्रदेश)
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