हमारे क़ब्रिस्तान किसके भरोसे ?
कमेटियां जवाब दें! वक़्फ़ बोर्ड जागे! क़ौम अपना ज़मीर जगाए
कहीं अंधेरा, कहीं गंदगी, कहीं झाड़-झंखाड़, कहीं आवारा जानवर और कहीं वर्षों से, सोई हुई व्यवस्था! आख़िर कब तक?
सवाल सिर्फ़ सफ़ाई का नहीं, हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी, जवाबदेही और मरहूमों की आख़िरी आरामगाहों की हिफ़ाज़त का है
कब्रिस्तान किसी की जागीर नहीं, पूरी क़ौम की अमानत हैं
मस्जिदों के निज़ाम पर बात हुई, इमामों की ज़िम्मेदारियों पर बात हुई, मदरसों की शिक्षा व्यवस्था और कमेटियों के कामकाज पर सवाल उठे। इन विषयों पर आवाज़ बुलंद हुई, तो कई जगह सुधार की शुरुआत भी हुई लेकिन अब एक और महत्वपूर्ण विषय पर ख़ामोशी तोड़ने का वक़्त आ गया है। हमारे कब्रिस्तानों की व्यवस्था, उनकी देखरेख और उनकी हिफ़ाज़त। आख़िर कब तक हमारे बुज़ुर्गों, वालिदैन, उस्तादों, उलमा, मशाइख़ और अज़ीज़ों की आख़िरी आरामगाहें लापरवाही का शिकार रहेंगी? क़ब्रिस्तान के नाम पर कमेटियां हैं, पदाधिकारी हैं, बैठकें हैं, मगर क्या हर जगह ज़मीनी व्यवस्था भी उतनी ही मज़बूत है?
भारत के कब्रिस्तानों का मेरा आँखों देखा हाल
मैं, सैफुल्लाह क़ादरी, भारत के विभिन्न इलाक़ों का सफ़र करता रहता हूं। जिस तरह मस्जिदों, मदरसों, जामिया और दारुल उलूम का दौरा करता हूं, उसी तरह अलग-अलग शहरों और बस्तियों के क़ब्रिस्तानों को भी देखता हूं। कई जगहों पर क़ब्रिस्तानों की बदहाली देखकर, दिल रो पड़ता है। कहीं झाड़ियां और जंगली घास इतनी बढ़ जाती हैं कि रास्ते तक नज़र नहीं आते। कहीं कूड़े-कचरे के ढेर हैं, कहीं पानी की निकासी का इंतज़ाम नहीं, कहीं टूटी हुई चारदीवारी है और कहीं क़ब्रों के बीच से गुज़रना भी मुश्किल हो जाता है। कहीं रात के समय घुप अंधेरा रहता है। न पर्याप्त स्ट्रीट लाइट, न रास्तों पर रोशनी और न प्रवेश द्वार पर उचित प्रकाश। जनाज़े के साथ आने वाले लोगों को अंधेरे में रास्ता तलाशना पड़ता है। कहीं क़ब्रिस्तान तक पहुंचने वाली सड़क गड्ढों और कीचड़ से भरी है। बरसात में जलभराव के कारण जनाज़े को ले जाना तक मुश्किल हो जाता है। कहीं झाड़-झंखाड़, कांटेदार झाड़ियां और घनी जंगली घास फैल जाती है। इससे क़ब्रों तक पहुंचना कठिन होता है और साँप-बिच्छू जैसे जीव-जंतुओं का ख़तरा भी बढ़ता है। कुछ क़ब्रिस्तानों में आवारा कुत्ते, सूअर, गाय, बैल और अन्य जानवर खुलेआम घूमते या प्रवेश कर जाते हैं। वे गंदगी फैलाते हैं, रास्ते बाधित करते हैं और क़ब्रों को नुक़सान पहुंचने का अंदेशा पैदा करते हैं।
ज़रा सोचिए! जिस जगह इंसान अपने मरहूमों के लिए सुकून और अदब के साथ फ़ातिहा पढ़ने आता है, अगर वहीं उसे कचरे, अंधेरे, झाड़ियों और आवारा जानवरों का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था पर कितना बड़ा सवाल है? कुछ जगहों पर हालात देखकर सचमुच ख़ून के आंसू बहाने को जी चाहता है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारत में कुछ ऐसे क़ब्रिस्तान भी मैंने देखे हैं, जहां पहुंचकर दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। साफ़-सुथरे रास्ते, व्यवस्थित क़ब्रें, हरियाली, पर्याप्त रोशनी और बेहतर रखरखाव देखकर महसूस होता है कि सही नीयत और व्यवस्था हो, तो क़ब्रिस्तान को भी अदब और ख़ूबसूरती के साथ संभाला जा सकता है। ऐसे तमाम क़ब्रिस्तानों की कमेटियों, ख़ादिमों और सहयोगियों को दिली मुबारकबाद, जिन्होंने अपनी मेहनत से दूसरों के लिए मिसाल क़ायम की है।
क़ब्रिस्तान कमेटियों से सीधे सवाल: अब हिसाब देना होगा
क़ब्रिस्तान की कमेटी कोई स्थायी जागीर नहीं, बल्कि एक अमानत और ज़िम्मेदारी है। कमेटी में पद हासिल करना, सम्मान की बात हो सकती है लेकिन उस पद का हक़ अदा करना, उससे कहीं बड़ी बात है। इसलिए हर कमेटी से कुछ बुनियादी सवाल हैं...
1. सफ़ाई का इंतज़ाम कहां है? क्या नियमित सफ़ाई होती है या केवल शिकायत अथवा किसी ख़ास अवसर पर ही सफ़ाई अभियान चलाया जाता है?
2. झाड़-झंखाड़ की सफ़ाई कौन करेगा? क्या जंगली घास, कांटेदार झाड़ियां और अनावश्यक पौधे समय पर हटाए जाते हैं?
3. रोशनी की व्यवस्था किसकी ज़िम्मेदारी है? क्या प्रवेश द्वार और मुख्य रास्तों पर पर्याप्त लाइटें लगी हैं? ख़राब लाइटों की मरम्मत समय पर होती है?
4. सड़क और रास्तों का क्या हाल है? क्या क़ब्रिस्तान तक पहुंचने वाली सड़क और अंदरूनी रास्ते दुरुस्त हैं? क्या बारिश में कीचड़ और जलभराव से बचाव का इंतज़ाम है?
5. आवारा जानवरों की रोकथाम कौन करेगा? क़ब्रिस्तान में कुत्ते, सूअर, गाय, बैल और अन्य जानवर कैसे प्रवेश कर जाते हैं? क्या चारदीवारी और गेट सुरक्षित हैं? क्या स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों से समन्वय किया जाता है?
6. चारदीवारी और ज़मीन की हिफ़ाज़त कौन कर रहा है? क्या सीमांकन और ज़मीन का रिकॉर्ड सुरक्षित है? क्या अतिक्रमण की शिकायतों पर कार्रवाई होती है?
7. दफ़न का रिकॉर्ड कहां है? क्या दफ़न का रजिस्टर व्यवस्थित है? क्या क़ब्रों की पहचान और स्थान का विवरण सुरक्षित रखा जाता है?
8. चंदे का हिसाब कहां है? कितना चंदा आया, कितना ख़र्च हुआ और किस काम पर ख़र्च हुआ? क्या आम लोगों को हिसाब दिखाया जाता है?
9. कमेटी की बैठकें कब होती हैं? क्या नियमित बैठकें होती हैं? क्या निर्णय लिखित रूप में दर्ज होते हैं? क्या लोगों की शिकायतें सुनी जाती हैं?
10. कमेटी के कार्यकाल का हिसाब कौन लेगा? पांच, दस या पंद्रह बीस सालों से पद संभालने वाले पदाधिकारियों ने अपने कार्यकाल में क्या सुधार किया? क्या कोई सार्वजनिक कार्य-रिपोर्ट है?
11. बुज़ुर्गों और दिव्यांग लोगों की सुविधा का क्या इंतज़ाम है? क्या उनके लिए सुरक्षित और आसान रास्ते उपलब्ध हैं?
ये सवाल किसी की बेइज़्ज़ती के लिए नहीं बल्कि जवाबदेही तय करने के लिए हैं। कमेटी पदों की सूची से नहीं, अपने काम की सूची से पहचानी जानी चाहिए!
कमेटियों की जवाबदेही: पद चाहिए तो काम भी दिखाना होगा
अब कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें कहने में संकोच नहीं होना चाहिए। कहीं-कहीं कमेटियां वर्षों से बनी हुई हैं लेकिन आम लोगों को यह तक मालूम नहीं कि उनका कार्यकाल कब पूरा होगा, चुनाव कब होंगे और नई कमेटी कैसे बनेगी? कहीं पदाधिकारी बदलते नहीं, जवाबदेही तय नहीं होती और व्यवस्था में सुधार भी नज़र नहीं आता। कहीं क़ब्रिस्तान के नाम पर चंदा तो इकट्ठा होता है लेकिन लोगों को यह जानकारी नहीं मिलती कि पैसा कहां और किस मद में ख़र्च हुआ? कहीं सफ़ाई के नाम पर केवल औपचारिकता होती है। कहीं शिकायत करने वाले को ही विरोधी समझ लिया जाता है। कहीं नए और योग्य लोगों को काम करने का अवसर नहीं दिया जाता। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कमेटी के पदाधिकारी अपनी ज़िम्मेदारियां निभा ही नहीं पा रहे, तो फिर उन पदों पर बने रहने का औचित्य क्या है?
क़ब्रिस्तान कोई खानदानी कुर्सी नहीं! यह किसी की निजी जागीर नहीं! यह पूरी क़ौम की अमानत है
यदि किसी कमेटी के पास समय नहीं है, संसाधन नहीं हैं, इच्छाशक्ति नहीं है या वह अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने में असमर्थ है, तो उसे पदों से चिपके रहने के बजाय स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। जो लोग बेहतर व्यवस्था कर सकते हैं, उन्हें आगे आने का अवसर मिलना चाहिए। नई टीम बने, ज़िम्मेदारियां बांटी जाएं, काम की समय-सीमा तय हो और हर कार्य का हिसाब लिया जाए। यह बदलाव संबंधित ट्रस्ट के नियमों, वक़्फ़ के प्रावधानों और लागू क़ानूनी प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।
कुर्सी बचाने से ज़्यादा ज़रूरी अमानत बचाना है। पद की मोहब्बत छोड़िए, क़ब्रिस्तान की हिफ़ाज़त कीजिए
और जो लोग केवल नाम, पद और अधिकार चाहते हैं, लेकिन काम और जवाबदेही से बचते हैं, उन्हें यह सवाल सुनना ही होगा... आप कमेटी में क्यों हैं? क़ब्रिस्तान की ख़िदमत के लिए या केवल कमेटी कहलाने के लिए?
उर्स के लिए ऐलान और बसें भर सकती हैं, तो क़ब्रिस्तान की ख़िदमत के लिए क्यों नहीं?
यहां मस्जिदों के इमामों, ख़तीबों, उलमा, मशाइख़ और धार्मिक आयोजनों के ज़िम्मेदारों से भी एक अदब के साथ, मगर बेहद गंभीर सवाल है। हम देखते हैं कि जब किसी शहर में किसी बुज़ुर्ग का उर्स होता है, किसी पीर का सालाना जलसा होता है या कोई जुलूस और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होता है, तो मस्जिदों में बाक़ायदा ऐलान किए जाते हैं। कहीं पंद्रह दिन बाद, कहीं महीने-दो महीने बाद लोगों को बुलाने के लिए बार-बार घोषणाएं होती हैं। एक बस, दो बसें, चार बसें तक रवाना होती हैं। दस, बीस, पचास, सौ और दो सौ लोगों तक के क़ाफ़िले तैयार होते हैं। लोगों को संगठित किया जाता है, आने-जाने का इंतज़ाम होता है और कार्यक्रम में शिरकत के लिए पूरी कोशिश की जाती है। यहां हमारा सवाल किसी उर्स, जलसे या जुलूस के विरुद्ध नहीं है। धार्मिक आयोजनों की अपनी जगह और अहमियत है। लेकिन सवाल यह है कि जिस माइक से उर्स का ऐलान हो सकता है, उसी माइक से क़ब्रिस्तान की सफ़ाई का ऐलान क्यों नहीं हो सकता? जिस आवाज़ से सैकड़ों लोगों को बसों में भरकर, किसी शहर के जलसे में भेजा जा सकता है, उसी आवाज़ से अपने ही शहर के क़ब्रिस्तान की सफ़ाई के लिए लोगों को क्यों नहीं बुलाया जा सकता? जिस तरह उर्स के लिए क़ाफ़िले तैयार होते हैं, क्या उसी तरह महीने में एक दिन क़ब्रिस्तान की सफ़ाई के लिए क़ाफ़िला तैयार नहीं हो सकता? जिस तरह धार्मिक कार्यक्रमों के लिए तारीख़, समय और स्थान बताया जाता है, क्या उसी तरह यह ऐलान नहीं हो सकता कि इतवार की सुबह फुलां क़ब्रिस्तान में सफ़ाई अभियान है, तमाम नौजवान और मोहल्ले के लोग पहुंचें? उर्स के लिए बसें भर सकती हैं, तो क़ब्रिस्तान की ख़िदमत के लिए नौजवान क्यों नहीं जुट सकते? जलसे के लिए भीड़ इकट्ठी हो सकती है, तो अपने मरहूमों की आख़िरी आरामगाह संवारने के लिए लोग क्यों नहीं जुट सकते?
इमाम साहब से गुज़ारिश है कि मस्जिद के मिम्बर और माइक को केवल धार्मिक कार्यक्रमों की घोषणाओं तक सीमित न रखें। क़ौम की सामाजिक और सामूहिक ज़िम्मेदारियों के लिए भी उसका इस्तेमाल करें। ख़तीब साहब अपने ख़ुत्बों में सफ़ाई, अमानत, वक़्फ़ संपत्तियों की हिफ़ाज़त और सामाजिक सेवा पर भी बात करें। उलमा और मशाइख़ अपनी सरपरस्ती में क़ब्रिस्तान सुधार अभियान शुरू कराएं। नौजवानों को संगठित करें। कमेटियों को सहयोग दें और जहाँ ज़रूरत हो, उनसे जवाबदेही भी मांगें। दीन की तालीम केवल सुनने-सुनाने तक सीमित नहीं; उसका एक बड़ा तक़ाज़ा ख़िदमते ख़ल्क़ भी है। मेरी अपील है कि हर मस्जिद में समय-समय पर क़ब्रिस्तान की सफ़ाई और सुधार के लिए बाक़ायदा ऐलान हो। हर मोहल्ले के नौजवानों की टीम बने। उर्स और जलसे के आयोजक भी अपने कार्यक्रमों के साथ सामाजिक सेवा अभियान जोड़ें। आख़िर हम अपने बुज़ुर्गों के लिए दुआ करते हैं, तो उनकी आख़िरी आरामगाहों की हिफ़ाज़त के लिए मेहनत क्यों नहीं कर सकते?
वक़्फ़ बोर्ड भी अपनी ज़िम्मेदारी पहचाने
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल वक़्फ़ बोर्ड से भी है। जिन क़ब्रिस्तानों की ज़मीन, वक़्फ़ के रूप में दर्ज है और जो संबंधित वक़्फ़ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, उनकी देखरेख, निगरानी और हिफ़ाज़त की व्यवस्था की समीक्षा कौन करेगा? क्या वक़्फ़ संपत्तियों की हिफ़ाज़त, सीमांकन, अतिक्रमण से बचाव और ज़िम्मेदार प्रबंधन की निगरानी को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए? हम संबंधित वक़्फ़ बोर्ड से माँग करते हैं कि...
- वक़्फ़ में दर्ज क़ब्रिस्तानों का ज़मीनी सर्वे और स्थिति की समीक्षा कराई जाए।
- जहाँ अतिक्रमण की शिकायतें हैं, वहाँ क़ानून के अनुसार कार्रवाई हो।
- मुतवल्लियों और प्रबंधन समितियों की जवाबदेही तय की जाए।
- जहाँ व्यवस्था अच्छी है, वहाँ अच्छे काम को प्रोत्साहित किया जाए।
- जहाँ लापरवाही सामने आए, वहाँ लागू नियमों के अनुसार सुधारात्मक क़दम उठाए जाएँ।
- आमदनी और ख़र्च का पारदर्शी रिकॉर्ड सुनिश्चित किया जाए।
- सफ़ाई, रोशनी, सड़क, चारदीवारी और जल निकासी की व्यवस्था की समीक्षा हो।
- आवारा जानवरों के प्रवेश को रोकने के लिए सुरक्षित गेट और चारदीवारी का इंतज़ाम हो।
- आम लोगों की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
वक़्फ़ बोर्ड से सवाल करना वक़्फ़ के ख़िलाफ़ होना नहीं, बल्कि वक़्फ़ की अमानतों की हिफ़ाज़त की मांग करना है। यह भी स्पष्ट रहे कि हर क़ब्रिस्तान, वक़्फ़ बोर्ड के अधीन नहीं होता। जहाँ वक़्फ़ का दर्जा नहीं है, वहाँ संबंधित ट्रस्ट, स्थानीय निकाय और वैधानिक प्रबंधन व्यवस्था अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ।
क़ौम से भी कुछ सवाल
हम क़ब्रिस्तान में अपने अज़ीज़ों को दफ़न करके लौट आते हैं। फिर कई बार महीनों और वर्षों तक उस ओर पलटकर भी नहीं देखते। क्या यह हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी नहीं कि क़ब्रिस्तान साफ़ रहे? क्या हम अपने घरों के आसपास सफ़ाई चाहते हैं, मगर अपने बुज़ुर्गों की आख़िरी आरामगाहों के मामले में उदासीन रहें? क्या हम केवल कमेटियों को दोष देकर, अपनी ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं?
क़ौम को भी आगे आना होगा। सफ़ाई अभियानों में सहयोग करना होगा, कूड़ा नहीं फैलाना होगा, प्लास्टिक और गंदगी से परहेज़ करना होगा, रास्तों को बाधित नहीं करना होगा और कब्रिस्तान की हिफ़ाज़त में अपना हिस्सा अदा करना होगा। क़ब्रिस्तान की सफ़ाई, केवल कमेटी का काम नहीं, पूरी क़ौम के ज़मीर का इम्तिहान है।
GHAUSE AZAM FOUNDATION की ख़िदमत ! बातों से आगे, मैदान में काम
क़ब्रिस्तानों की व्यवस्था सुधारने की इस मुहिम में GHAUSE AZAM FOUNDATION (ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) भी अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी के तहत सक्रिय रही है। फाउंडेशन के ज़रिये कब्रिस्तानों की सफ़ाई और व्यवस्था सुधारने के लिए अभियान चलाए गए हैं। इन अभियानों में फाउंडेशन के सदस्यों, सहयोगियों और संबंधित टीमों ने मिलकर मैदान में काम किया है। हमारा मानना है कि किसी सामाजिक संस्था की पहचान, केवल उसके नाम, पदाधिकारियों या प्रचार से नहीं, बल्कि उसके ज़मीनी काम से होती है। क़ब्रिस्तान की ख़िदमत कोई नारा नहीं, इंसानियत और सामाजिक ज़िम्मेदारी का अमली सबूत है। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चीफ़ ट्रस्टी, ट्रस्टियों, डायरेक्टर, पदाधिकारियों, सदस्यों और तमाम सहयोगियों को सलाम, जो इस नेक काम में अपना समय, मेहनत और सहयोग पेश कर रहे हैं।
क़ब्रिस्तान का मुकम्मल सुधार कैसे हो?
अब केवल सफ़ाई अभियान चलवा लेना पर्याप्त नहीं है। क़ब्रिस्तान की व्यवस्था के लिए स्थायी योजना चाहिए।
- नियमित सफ़ाई का लिखित शेड्यूल हो।
- झाड़-झंखाड़ और काँटेदार पौधों की नियमित कटाई हो।
- रास्तों और मुख्य सड़क की मरम्मत हो।
- प्रवेश द्वार और अंदरूनी रास्तों पर पर्याप्त रोशनी हो।
- जलभराव रोकने के लिए जल निकासी की व्यवस्था हो।
- चारदीवारी और प्रवेश द्वार सुरक्षित हों।
- आवारा कुत्तों, सूअरों, गायों, बैलों और अन्य जानवरों के प्रवेश को रोकने के लिए उचित व्यवस्था हो।
- जानवरों के साथ क्रूरता किए बिना स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों के सहयोग से समाधान किया जाए।
- ज़रूरत के अनुसार पानी और अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हों।
- बुज़ुर्गों और दिव्यांग लोगों की आवाजाही का ध्यान रखा जाए।
- क़ब्रों की पहचान और दफ़न का रजिस्टर व्यवस्थित हो।
- क़ब्रिस्तान की ज़मीन का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए।
- चंदे और ख़र्च का नियमित हिसाब सार्वजनिक हो।
- हर साल कमेटी अपने कार्यों की रिपोर्ट पेश करे।
क़ब्रों की मर्यादा और शरई अदब का पूरा ध्यान रखा जाए। सुधार के नाम पर क़ब्रों को नुक़सान पहुंचाना, बेवजह छेड़छाड़ करना या ऐसे निर्माण करना, जिनकी शरई और क़ानूनी अनुमति न हो, उचित नहीं है।
अब ख़ामोशी नहीं, जवाबदेही और सुधार चाहिए
मेरी यह तहरीर किसी एक कमेटी, एक शहर या एक संस्था के विरुद्ध नहीं है। यह उन तमाम क़ब्रिस्तानों के सुधार की आवाज़ है, जहां व्यवस्था की आवश्यकता है। जो कमेटियां अच्छा काम कर रही हैं, वे हमारे लिए मिसाल हैं। जो कमेटियां कमज़ोर हैं, उन्हें सुधार का अवसर मिलना चाहिए। और जो लगातार अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में असमर्थ हैं, उन्हें क़ानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ज़िम्मेदारी, सक्षम लोगों को सौंप देनी चाहिए। वक़्फ़ बोर्ड को अपने अधिकार क्षेत्र में ज़िम्मेदारी निभानी होगी। कमेटियों को जवाबदेह बनना होगा। क़ौम को जागना होगा। उलमा, इमामों और सामाजिक संस्थाओं को भी इस काम में आगे आना होगा। अब क़ब्रिस्तान की बदहाली को सामान्य मानकर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। केवल फ़ातिहा पढ़कर लौटना ही नहीं, अपनी आख़िरी आरामगाहों की हिफ़ाज़त का इंतज़ाम करना भी हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
याद रखिए! क़ब्रिस्तान की दीवारें ख़ामोश हो सकती हैं, मगर उनकी बदहाली पर उठने वाले सवाल ख़ामोश नहीं होने चाहिए, क़ब्रें हमारी तारीख़ हैं, बुज़ुर्ग हमारी विरासत हैं और क़ब्रिस्तान हमारी सामूहिक अमानत हैं। अब इस अमानत की हिफ़ाज़त के लिए आवाज़ बुलंद करनी ही होगी।
ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के ख़िदमतगारों के नाम दुआ
अल्लाह तआला GHAUSE AZAM FOUNDATION के चीफ़ ट्रस्टी, ट्रस्टियों, डायरेक्टर, तमाम पदाधिकारियों, सदस्यों और सहयोगियों की ख़िदमात को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमाए तथा उनके वक़्त, मेहनत और माल में बरकत अता फ़रमाए। अल्लाह उन्हें इख़्लास, इस्तिक़ामत और ख़िदमते ख़ल्क़ का जज़्बा अता फ़रमाकर, इस नेक मिशन को और अधिक कामयाबी से आगे बढ़ाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन सुम्मा आमीन।
-सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी-
चेयरमैन: GHAUSE AZAM FOUNDATION | जयपुर | राजस्थान | 93586 49187
Comments (0)
Published By
More in this category

दैनिक भास्कर के गोरखपुर स्टिंग ऑपरेशन के संदर्भ में "हलाला" की वास्तविक इस्लामी हकीकत

हसद: एक विनाशकारी मानसिक बीमारी

मदरसे बचाने हैं तो मदरसों का निज़ाम बदलना होगा
Most Popular Posts

मस्जिदों का निज़ाम बदलिए
👁 390 Views

न्यूज़होम: भारत के 14 भाषा वाला हाइपरलोकल न्यूज़ प्लेटफॉर्म लॉन्च
👁 273 Views

20 साल की दुबली-पतली लड़की 'रुखसाना कौसर' जिसे कमजोर समझना आतंकियों को भारी पड़ गया
👁 223 Views

Seraj Ahmad Quraishi was honored with Samrat Ashok Award
👁 196 Views

समान नागरिक संहिता को लेकर सुन्नी ओलमा ने जताया विरोध, बताया असंवैधानिक और मजहबी मामलों में हस्तक्षेप
👁 189 Views
