हसद: एक विनाशकारी मानसिक बीमारी
कारण, धार्मिक एवं नैतिक नुक़सान और बचने के प्रभावी उपाय
लेखक: मुहम्मद शमीम अहमद नूरी मिस्बाही
ख़ादिम: दारुल उ़लूम अनवारे मुस्तफ़ा, सैहलाऊ शरीफ़, बाड़मेर (राजस्थान)
इंसान के व्यक्तित्व को बनाने और बिगाड़ने में जहाँ कई बाहरी कारण काम करते हैं, वहीं कुछ ऐसी अंदरूनी बुराइयाँ भी होती हैं, जो इंसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देती हैं। इन्हीं में एक बहुत खतरनाक और विनाशकारी बीमारी हसद (जलन) है।
हसद केवल दिल की कोई बुरी भावना या किसी की तरक़्क़ी देखकर थोड़ी देर के लिए परेशान हो जाने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी मानसिक और नैतिक बीमारी है, जो इंसान के दिल का सुकून, अच्छे चरित्र, सामाजिक संबंधों और आध्यात्मिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है।
हसद की सबसे बड़ी दुखद बात यह है कि इसकी आग में सबसे पहले खुद हसद करने वाला इंसान जलता है, जबकि जिस व्यक्ति के प्रति उसके दिल में जलन होती है, वह कई बार उसकी इस हालत से बेखबर अपनी ज़िंदगी में व्यस्त रहता है।
हसद क्या है? इसकी सच्चाई को समझना ज़रूरी है:
हसद की असलियत यह है कि जब कोई इंसान दूसरे व्यक्ति को मिली हुई नेअ़मत, अच्छाई, कामयाबी, इज़्ज़त, शोहरत, दौलत, इल्म, योग्यता या लोकप्रियता देखता है तो उसके दिल में जलन पैदा होती है और वह यह चाहने लगता है कि दूसरे व्यक्ति से यह नेअ़मत छिन जाए, चाहे उसे खुद वह नेअ़मत मिले या न मिले।
दूसरे शब्दों में, किसी की खुशहाली को अपनी बदहाली, किसी की कामयाबी को अपनी नाकामी और किसी की लोकप्रियता को अपनी कमी समझने का नाम हसद है।
यह भावना उस समय और भी खतरनाक हो जाती है, जब इंसान दूसरे की नेअ़मत खत्म होने की इच्छा से आगे बढ़कर उसके खिलाफ साज़िशें करने, उसकी छवि खराब करने, उसकी कामयाबी पर सवाल उठाने, उसकी इज़्ज़त को नुक़सान पहुँचाने और उसके रास्ते में रुकावटें पैदा करने लगता है।
याद रखिए! हसद करने वाला वास्तव में केवल किसी दूसरे इंसान से ही नहीं जलता, बल्कि उस नेअ़मत की अ़ता पर भी दिल में नाराज़गी महसूस करता है, जिसे अल्लाह तआ़ला ने अपनी हिकमत और मर्ज़ी से दूसरे व्यक्ति को दिया है। मानो वह अल्लाह तआ़ला की तक़सीम पर नाराज़गी ज़ाहिर कर रहा होता है, जबकि नेअ़मतें बाँटने का अधिकार केवल उसी अल्लाह के पास है।
अल्लाह तआ़ला फरमाता है:
﴿أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَىٰ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ﴾
अनुवाद: क्या ये लोगों से इस बात पर जलते हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने फज़्ल से कुछ अ़ता फरमाया है? (सूरह अन-निसा: 54)
यह आयत हसद की सच्चाई को बहुत स्पष्ट रूप से बताती है कि दूसरों को मिली हुई अल्लाह की नेअ़मतों से जलना वास्तव में अल्लाह की अ़ता पर एतराज़ करने का एक बहुत बुरा रूप है।
हसद करने वाला और जिससे हसद किया जाए: एक अ़जीब मानसिक रिश्ता:
हसद करने वाले और जिससे हसद किया जाता है, उनका रिश्ता देखने में दुश्मनी, जलन और विरोध पर आधारित दिखाई देता है। लेकिन इस रिश्ते का एक मानसिक पहलू भी है।
कभी ऐसा होता है कि एक योग्य इंसान अपनी खूबियों और क्षमताओं से पूरी तरह परिचित नहीं होता। वह अपनी योग्यता को मामूली समझता है और उसकी क़द्र नहीं करता। लेकिन जब कोई हसद करने वाला उसकी खूबियों को नकारता है, उसकी कामयाबियों को छोटा बताता है और उसे नीची नज़र से देखता है, तो कभी-कभी उसे अपनी क्षमताओं की अहमियत का एहसास होने लगता है।
वह अपनी छिपी हुई खूबियों को पहचानता है, अपनी कमज़ोरियों को दूर करता है और पहले से अधिक मेहनत करके अपनी मंज़िल की ओर बढ़ने लगता है।
इस तरह कभी-कभी विरोधी की बेवजह की आलोचना भी उस व्यक्ति के लिए आत्म-सुधार और जागरूकता का कारण बन जाती है।
लेकिन यह बात साफ रहनी चाहिए कि हसद करने वाले की बुरी नीयत कोई एहसान नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की तरक़्क़ी उसके अपने इरादे, मेहनत, सब्र और अल्लाह तआ़ला के फज़्ल का नतीजा होती है।
समझदार इंसान विरोध से घबराने के बजाय उसे अपनी कमियों को दूर करने और खुद को मज़बूत बनाने का ज़रिया बनाता है। यही ऊँचे विचार और कामयाब व्यक्तित्व की पहचान है।
हसद करने वाले का व्यवहार: योग्यता और लोकप्रियता का एक संभावित संकेत:
कभी-कभी हसद करने वाले का व्यवहार इंसान की योग्यता और लोकप्रियता के बारे में एक खास मानसिक संकेत देता है।
वह आपकी खूबियों को मानने के बजाय उनमें कमियाँ निकालता है, आपकी कामयाबी को महज़ इत्तेफाक़ बताता है, आपके कामों को मामूली साबित करने की कोशिश करता है और आपकी इज़्ज़त तथा लोकप्रियता से परेशान दिखाई देता है।
कई बार इंसान की जिन खूबियों को वह खुद मामूली समझता है, वे दूसरों की नज़र में बहुत अहम होती हैं। किसी की लगातार मुखालफत, बेवजह की आलोचना और असामान्य नाराज़गी कभी इस बात का संकेत भी हो सकती है कि उस व्यक्ति में कोई ऐसी खूबी मौजूद है, जिसे उसका विरोधी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है।
लेकिन यहाँ एक ज़रूरी बात समझना भी बहुत ज़रूरी है: हर आलोचना हसद नहीं होती, हर मतभेद दुश्मनी नहीं होता और हर विरोध करने वाला बदख्वाह नहीं होता।
कभी कोई सच्चा और हमदर्द इंसान भी हमारी भलाई के लिए हमारी ग़लतियों की ओर ध्यान दिलाता है। इसलिए किसी की आलोचना को तुरंत हसद समझने के बजाय उसके मक़सद, अंदाज और व्यवहार का निष्पक्ष रूप से जायज़ा लेना चाहिए।
समझदार वही है, जो सच्ची आलोचना से अपनी इस्लाह करे और हसद भरे विरोध से प्रभावित हुए बिना अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता रहे।
हसद: एक ऐसी सज़ा, जिसे इंसान खुद अपने लिए चुनता है:
दुनिया में बहुत से गुनाहों और बुराइयों का असर किसी न किसी समय इंसान के सामने आता है, लेकिन हसद की तकलीफ इस मामले में अलग है कि इसका शिकार व्यक्ति अपनी ज़िंदगी का अधिकतर समय दूसरों की खुशहाली से परेशान होकर गुज़ारता है।
उसे किसी दूसरे की खुशी अपनी परेशानी, किसी की तरक़्क़ी अपनी कमी, किसी की इज़्ज़त अपनी बेइज़्ज़ती और किसी की कामयाबी अपनी हार महसूस होती है।
वह सुबह उठता है तो किसी की तरक़्क़ी का ख्याल उसे बेचैन करता है। दिन गुज़रता है तो किसी की लोकप्रियता उसे परेशान रखती है और रात आती है तो किसी की खुशहाली का ख्याल उसकी नींद उड़ा देता है।
दुनिया में नेअ़मतें अनगिनत हैं। किसी के पास इल्म है, किसी के पास दौलत; किसी को इज़्ज़त मिली है, किसी को शोहरत; कोई अच्छे अखलाक़ में आगे है, कोई अपनी योग्यताओं में मशहूर है; किसी को औलाद की खुशियाँ मिली हैं तो किसी को पद और सत्ता हासिल है।
अब ज़रा उस इंसान के बारे में सोचिए, जिसे हर दूसरे व्यक्ति की खुशहाली से तकलीफ होती हो। ज़ाहिर है कि उसकी परेशानियों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, क्योंकि दुनिया में नेअ़मतें खत्म होने वाली नहीं हैं और हसद करने वाले की नज़र भी दूसरों की नेअ़मतों से हटने वाली नहीं है।
इस तरह वह अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा उन चीज़ों के ग़म में गुज़ार देता है, जो न कभी उसकी मिल्कियत थीं, न उसके अधिकार में थीं और न ही उनके छिन जाने से उसे कोई वास्तविक फायदा मिलने वाला था।
सच्चाई यह है कि हसद करने वाला दूसरे की नेअ़मत छिनने की इच्छा में अपनी नेअ़मतों का आनंद भी खो देता है।
हसद के कारण: दिल में यह आग क्यों भड़कती है?
हसद अचानक पैदा होने वाली भावना नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई मानसिक और नैतिक कारण होते हैं। यदि इन कारणों को पहचान लिया जाए तो इस बीमारी के इलाज में काफी मदद मिल सकती है।
1. हीन भावना (खुद को दूसरों से कम समझना): कुछ लोग अपनी खूबियों और योग्यताओं को पहचानने के बजाय हर समय दूसरों से अपनी तुलना करते रहते हैं। जब उन्हें कोई व्यक्ति अपने से आगे दिखाई देता है तो उनके अंदर कमी और निराशा का एहसास पैदा होता है, जो धीरे-धीरे हसद का रूप ले लेता है।
2. पद और शोहरत की चाहत: कुछ लोग चाहते हैं कि हर जगह उन्हीं का नाम हो, उन्हीं की तारीफ की जाए और हर महफिल में उन्हीं को महत्व मिले। जब किसी दूसरे को इज़्ज़त, शोहरत या लोकप्रियता मिलती है तो उनके लिए उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है।
3. घमंड और खुद को बड़ा समझना: घमंडी इंसान दूसरों को अपने बराबर या अपने से बेहतर देखना पसंद नहीं करता। उसे यह बर्दाश्त नहीं होता कि किसी दूसरे को ऐसी खूबी या विशेषता हासिल हो, जिससे वह खुद वंचित है।
4. दुनिया की मोहब्बत और लालच: माल, पद, शोहरत और दुनियावी आराम की ज़रूरत से ज़्यादा चाहत भी हसद का एक बड़ा कारण है। जब इंसान दुनिया को ही ज़िंदगी का सबसे बड़ा मक़सद बना लेता है तो दूसरों की तरक़्क़ी उसे अपनी कमी महसूस होने लगती है।
5. ग़लत तरीक़े की प्रतिस्पर्धा: अच्छा और स्वस्थ मुक़ाबला इंसान को मेहनत तथा तरक़्क़ी की ओर ले जाता है, लेकिन जब मुक़ाबले में ईमानदारी खत्म हो जाए और मक़सद दूसरे को नीचा दिखाना बन जाए तो यही भावना हसद में बदल जाती है।
6. बदगुमानी और आपसी दुश्मनी: कभी-कभी पुरानी रंजिशें, व्यक्तिगत मतभेद और बेबुनियाद ग़लतफहमियाँ भी हसद की आग को बढ़ा देती हैं। इंसान किसी से इतना बदगुमान हो जाता है कि उसकी हर कामयाबी उसे बुरी लगने लगती है।
हसद के धार्मिक, नैतिक और सामाजिक नुक़सान:
हसद केवल एक व्यक्ति की निजी परेशानी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के नैतिक और सामूहिक व्यवस्था को प्रभावित करने की ताक़त रखता है। इसके कुछ प्रमुख नुक़सान निम्नलिखित हैं:
1. अल्लाह की तक़सीम से नाराज़गी: हसद इंसान को ऐसी खतरनाक हालत में पहुँचा देता है कि वह दूसरों को मिली हुई अल्लाह की नेअ़मतों पर दिल में नाराज़गी महसूस करने लगता है, जबकि अल्लाह तआ़ला हकीम और सब कुछ जानने वाला है। वही बेहतर जानता है कि किस बंदे को क्या देना उचित है।
2. दिल की आध्यात्मिक पवित्रता का प्रभावित होना: हसद दिल में नफरत, दुश्मनी और द्वेष पैदा करता है। ये अंदरूनी बुराइयाँ इंसान की आध्यात्मिक पवित्रता को प्रभावित करती हैं और इबादत में ध्यान तथा विनम्रता को कमज़ोर कर देती हैं।
3. ग़ीबत, झूठे आरोप और बदनामी: हसद करने वाला अक्सर दूसरे व्यक्ति की इज़्ज़त और शोहरत को नुक़सान पहुँचाने के लिए उसकी पीठ पीछे बुराई करता है, उस पर झूठे आरोप लगाता है, उसकी खूबियों को छिपाता है और उसकी कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है। इस तरह दिल की एक बीमारी कई बाहरी गुनाहों का रास्ता खोल देती है।
4. रिश्तों और संबंधों का बर्बाद होना: हसद भाई को भाई से, दोस्त को दोस्त से, पड़ोसी को पड़ोसी से और कभी-कभी एक ही परिवार के लोगों को एक-दूसरे से दूर कर देता है। जिस घर में एक-दूसरे की खुशी में खुश होने का जज़्बा खत्म हो जाए, वहाँ मोहब्बत और सुकून बाक़ी नहीं रह सकता।
5. सामूहिक तरक़्क़ी में रुकावट: हसद का शिकार इंसान दूसरों की कामयाबी में सहयोग करने के बजाय उनके रास्ते में रुकावटें पैदा करता है। इस तरह संस्थाएँ, संगठन, शिक्षण केंद्र और सामाजिक आंदोलन आपसी मतभेद तथा बिखराव का शिकार हो जाते हैं।
6. मानसिक सुकून का खत्म होना: हसद करने वाला हर समय दूसरों के हालात पर नज़र रखता है। कौन आगे बढ़ गया? किसकी तारीफ हुई? किसकी आमदनी बढ़ी? किसका नाम मशहूर हुआ? इस लगातार मानसिक उलझन के कारण वह अपने काम, ज़िम्मेदारियों और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने से ग़ाफ़िल हो जाता है।
7. आखिरत का नुक़सान: जब हसद ग़ीबत, झूठे आरोप, ज़ुल्म, दूसरों के अधिकार छीनने और रिश्ते तोड़ने का रूप ले लेता है तो यह इंसान के लिए आखिरत के बड़े नुक़सान का कारण बन जाता है। दूसरों के हक़ मारने की वजह से क़यामत के दिन अपनी नेकियों से वंचित होने का खतरा भी पैदा हो जाता है।
कुरआन और हदीस की रोशनी में हसद की बुराई:
इस्लाम ने इंसानी समाज को मोहब्बत, भलाई चाहने, भाईचारे और आपसी सम्मान की शिक्षा दी है, जबकि हसद इन सभी खूबियों के बिल्कुल खिलाफ है।
अल्लाह तआ़ला ने सूरह फलक में हसद करने वाले के नुक़सान से अपनी पनाह माँगने की शिक्षा देते हुए फरमाया:
﴿وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾
अनुवाद: और हसद करने वाले के शर से, जब वह हसद करे। (सूरह अल-फलक: 5)
ग़ौर कीजिए! अल्लाह तआ़ला ने हमें हसद करने वाले के नुक़सान से अपनी पनाह में आने की शिक्षा दी है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब हसद अ़मल का रूप ले लेता है तो वह दूसरों के लिए नुक़सान और तकलीफ का कारण बन सकता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने आपसी संबंधों को सुधारने और दिलों को साफ रखने के लिए फरमाया:
«لَا تَحَاسَدُوا، وَلَا تَنَاجَشُوا، وَلَا تَبَاغَضُوا، وَلَا تَدَابَرُوا، وَلَا يَبِعْ بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَيْعِ بَعْضٍ، وَكُونُوا عِبَادَ اللَّهِ إِخْوَانًا»
(सहीह मुस्लिम, जिल्द 2, पृष्ठ 317, मजलिसे बरकात, मुबारकपुर)
अनुवाद: आपस में हसद न करो, एक-दूसरे को धोखा देने के लिए क़ीमत न बढ़ाओ, एक-दूसरे से नफरत न करो, एक-दूसरे से मुँह न फेरो और एक-दूसरे के सौदे पर अपना सौदा न करो, बल्कि अल्लाह के बंदो! आपस में भाई-भाई बनकर रहो।
यह हदीस इस्लामी समाज की ऐसी बुनियाद बताती है, जिस पर मोहब्बत, भरोसा, भाईचारा और एक-दूसरे की भलाई चाहने वाला समाज क़ायम होता है।
हसद की बुराई के साथ-साथ एक दूसरी हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने दो प्रकार के लोगों के लिए एक अच्छी भावना का जिक्र फरमाया:
«لَا حَسَدَ إِلَّا فِي اثْنَتَيْنِ: رَجُلٌ آتَاهُ اللَّهُ الْقُرْآنَ فَهُوَ يَقُومُ بِهِ آنَاءَ اللَّيْلِ وَآنَاءَ النَّهَارِ، وَرَجُلٌ آتَاهُ اللَّهُ مَالًا فَهُوَ يُنْفِقُهُ آنَاءَ اللَّيْلِ وَآنَاءَ النَّهَارِ»
(सहीह मुस्लिम, जिल्द 1, पृष्ठ 272, मजलिसे बरकात)
अनुवाद: रश्क केवल दो व्यक्तियों पर किया जा सकता है। एक वह जिसे अल्लाह ने कुरआन का इल्म दिया और वह रात-दिन उसके अनुसार अ़मल करता है। दूसरा वह जिसे अल्लाह ने माल दिया और वह रात-दिन उसे अल्लाह की राह में खर्च करता है।
यहाँ हसद से मतलब जायज़ रश्क है, जिसे अ़रबी भाषा में ग़िब्ता कहा जाता है। यानी किसी दूसरे को कोई नेअ़मत मिली देखकर यह इच्छा करना कि काश अल्लाह तआ़ला मुझे भी ऐसी नेअ़मत अ़ता फरमाए, लेकिन उस व्यक्ति से वह नेअ़मत छिन जाने की इच्छा बिल्कुल न हो।
इससे पता चलता है कि इस्लाम इंसान को दूसरों की नेअ़मतों से जलने के बजाय उनके जैसी नेकी और भलाई हासिल करने की प्रेरणा देता है।
हसद और ग़िब्ता में अंतर: एक ज़रूरी बात:
बहुत से लोग हसद और ग़िब्ता के अंतर को नहीं समझते, जबकि दोनों में बुनियादी फर्क़ है।
हसद यह है कि किसी व्यक्ति को मिली हुई नेअ़मत छिन जाने की इच्छा की जाए, जबकि ग़िब्ता यह है कि किसी को नेअ़मत मिली देखकर अपने लिए भी वैसी ही नेअ़मत की इच्छा की जाए, लेकिन दूसरे की नेअ़मत उसके पास रहने पर कोई आपत्ति न हो।
उदाहरण के तौर पर, किसी आ़लिम को इल्मी मक़ाम हासिल है। अगर कोई व्यक्ति यह चाहे कि उसका इल्मी मक़ाम खत्म हो जाए तो यह हसद है। लेकिन अगर वह यह इच्छा करे कि अल्लाह तआ़ला मुझे भी ऐसा इल्म, अ़मल और मक़ाम अ़ता फरमाए तो यह ग़िब्ता है।
इसी तरह किसी मालदार को देखकर उसके माल के खत्म होने की इच्छा करना हसद है, जबकि यह चाहना कि अल्लाह तआ़ला मुझे भी हलाल और पाकीज़ा माल अ़ता फरमाए, ताकि मैं उससे अच्छे कामों में हिस्सा ले सकूँ, ग़िब्ता है।
इसलिए एक मुसलमान को हसद से बचते हुए ग़िब्ता और अच्छी प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करनी चाहिए।
हर दिल में आने वाला विचार हसद नहीं: एक ज़रूरी शरई स्पष्टीकरण:
इंसान के दिल में तरह-तरह के विचार और भावनाएँ पैदा होती रहती हैं। कभी किसी की कामयाबी देखकर बिना चाहे ही दिल में थोड़ी बेचैनी या जलन का एहसास हो सकता है। लेकिन केवल ऐसा विचार आ जाने से इंसान को तुरंत गुनहगार नहीं कहा जा सकता, जब तक वह जान-बूझकर उस भावना को अपने दिल में जगह न दे, उसे बढ़ावा न दे या उसके अनुसार कोई ग़लत काम न करे।
इस संबंध में रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
«إِنَّ اللَّهَ تَجَاوَزَ لِأُمَّتِي مَا حَدَّثَتْ بِهِ أَنْفُسَهَا، مَا لَمْ تَعْمَلْ أَوْ تَتَكَلَّمْ»
(सहीह बुखारी, जिल्द 2, पृष्ठ 794; सहीह मुस्लिम, जिल्द 1, पृष्ठ 78, मजलिसे बरकात)
अनुवाद: अल्लाह तआ़ला ने मेरी उम्मत के दिलों में पैदा होने वाले उन विचारों को माफ फरमा दिया है, जब तक वे उन पर अ़मल न करें या उन्हें अपनी ज़बान से ज़ाहिर न करें।
इस हदीस से मालूम होता है कि बिना इच्छा के दिल में आने वाले बुरे ख्यालों और वसवसों पर पकड़ नहीं है। लेकिन इंसान को चाहिए कि ऐसे नकारात्मक जज़्बात को अपने दिल में जगह देने के बजाय तुरंत अल्लाह तआ़ला की ओर रुख करे और अपने अंदर सुधार लाने की कोशिश करे।
हसद का इलाज: दिल को पाक कैसे बनाया जाए?
हसद एक अंदरूनी बीमारी है, इसलिए इसका असली इलाज भी दिल की इस्लाह, सोच को सही करने और व्यवहार में सुधार लाने में छिपा है।
केवल ज़बान से यह कह देना काफी नहीं कि मैं किसी से हसद नहीं करता, बल्कि अपने दिल की लगातार निगरानी और उसकी सही तरबियत ज़रूरी है।
इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं:
1. अल्लाह तआ़ला की तक़सीम पर राजी रहिए:
सबसे पहले अपने दिल में यह यक़ीन मज़बूत कीजिए कि दुनिया की हर नेअ़मत अल्लाह तआ़ला की अ़ता है। वह जिसे चाहता है, अपने फज़्ल और हिकमत से नेअ़मतें अ़ता फरमाता है। दूसरों को मिलने वाली नेअ़मत आपके हिस्से की नेअ़मत को कम नहीं करती।
कुरआन मजीद में अल्लाह तआ़ला फरमाता है:
﴿نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُمْ مَعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا﴾
अनुवाद: हमने ही दुनिया की ज़िंदगी में उनके बीच उनकी रोज़ी बाँटी है। (सूरह अज़-जुखरुफ: 32)
जब रोज़ी और नेअ़मतों की तक़सीम अल्लाह के अधिकार में है तो बंदे को उसकी तक़सीम पर एतराज़ करने के बजाय अपने हिस्से पर शुक्र अदा करना चाहिए और उससे और अधिक फज़्ल की दुआ़ माँगनी चाहिए।
2. अपनी नेअ़मतों को पहचानिए:
हसद का एक बड़ा कारण यह है कि इंसान दूसरों की नेअ़मतें तो देखता है, लेकिन अपनी नेअ़मतों को नज़रअंदाज कर देता है।
वह दूसरों की दौलत देखता है, मगर अपनी सेहत भूल जाता है। दूसरों की शोहरत देखता है, मगर अपने परिवार की मोहब्बत को नज़रअंदाज कर देता है। दूसरों का पद देखता है, मगर अपने इल्म, ईमान और इज़्ज़त को भूल जाता है।
अगर इंसान रोजाना कुछ मिनट अपनी नेअ़मतों पर विचार करे तो उसे मालूम होगा कि वह खुद भी अल्लाह तआ़ला के अनगिनत एहसानों के साये में ज़िंदगी गुज़ार रहा है।
3. जिससे हसद हो, उसके लिए दुआ़ कीजिए:
यह हसद के इलाज का एक बहुत प्रभावी और व्यावहारिक तरीक़ा है।
जब किसी की तरक़्क़ी या कामयाबी देखकर दिल में जलन महसूस हो तो तुरंत उसके लिए भलाई और बरकत की दुआ़ कीजिए। उदाहरण के तौर पर कहिए:
या अल्लाह! मेरे इस भाई को और अधिक तरक़्क़ी अ़ता फरमा, उसके इल्म, अ़मल, माल और इज़्ज़त में बरकत अ़ता फरमा और मुझे भी अपने फज़्ल से जायज़ और पाकीज़ा नेअ़मतों से नवाज़ दे।
शुरुआ़त में यह काम नफ्स पर भारी महसूस हो सकता है, लेकिन लगातार अभ्यास करने से दिल की कड़वाहट कम होने लगती है और धीरे-धीरे दूसरों की खुशी में खुश होने की आ़दत पैदा हो जाती है।
4. जिससे हसद हो, उसकी खूबियों को स्वीकार कीजिए:
जिस व्यक्ति से हसद हो, उसकी अच्छाइयों को तलाश कीजिए। अगर वह आ़लिम है तो उसके इल्म की तारीफ कीजिए, अगर वह कामयाब है तो उसकी मेहनत को स्वीकार कीजिए और अगर वह अच्छे चरित्र वाला है तो उसके अच्छे अखलाक़ की प्रशंसा कीजिए।
किसी की खूबी को स्वीकार करने से इंसान छोटा नहीं होता, बल्कि उसका दिल और व्यक्तित्व बड़ा होता है।
5. अपनी इस्लाह और तरक़्क़ी पर ध्यान दीजिए:
दूसरों की ज़िंदगी में झाँकने के बजाय अपनी ज़िंदगी का जायज़ा लीजिए। यह देखिए कि आप कहाँ खड़े हैं, आपकी कमज़ोरियाँ क्या हैं और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए किन योग्यताओं को बेहतर बनाने की ज़रूरत है।
अगर आपको किसी का इल्म प्रभावित करता है तो खुद इल्म हासिल कीजिए। किसी की आर्थिक खुशहाली देखकर जलन होती है तो हलाल रोज़ी के लिए मेहनत कीजिए और किसी की लोकप्रियता बुरी लगती है तो अपने अखलाक़ और चरित्र को बेहतर बनाइए।
याद रखिए! दूसरों की कामयाबी से जलने पर आप कामयाब नहीं होंगे, लेकिन उनकी अच्छी आ़दतों से सीखने और मेहनत करने से अपनी मंज़िल ज़रूर हासिल कर सकते हैं।
6. दूसरों की कामयाबी को खुले दिल से स्वीकार कीजिए:
जब किसी को कामयाबी मिले तो उसे मुबारकबाद दीजिए, उसकी हौसला-अफज़ाई कीजिए और उसके लिए भलाई की दुआ़ कीजिए।
किसी की कामयाबी पर खुश होना भी एक अच्छी आ़दत है, जिसे लगातार अभ्यास से अपने अंदर पैदा किया जा सकता है।
7. हसद पैदा करने वाले कारणों से दूर रहिए:
अगर किसी व्यक्ति की ज़िंदगी, कामयाबियों या सुख-सुविधाओं को बार-बार देखने से आपके दिल में जलन पैदा होती है तो बेवजह उसके हालात पर नज़र रखना छोड़ दीजिए।
दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी ज़िम्मेदारियों पर ध्यान दीजिए।
सोशल मीडिया पर दूसरों की बाहरी खुशहाली देखकर अपनी जिंदगी को छोटा और बेकार समझना भी इस मानसिक परेशानी को बढ़ा सकता है। याद रखिए कि आप दूसरों की जिंदगी का केवल बाहरी हिस्सा देखते हैं, उनकी परेशानियों और आज़माइशों से परिचित नहीं होते।
8. तौबा, इस्तिग़फार और अल्लाह के ज़िक्र का एहतिमाम कीजिए:
दिल की पाकीज़गी के लिए अल्लाह तआ़ला की ओर रुख कीजिए, अधिक से अधिक इस्तिग़फार कीजिए, कुरआन की तिलावत कीजिए और ज़िक्र तथा दुरूद शरीफ का एहतिमाम कीजिए।
अल्लाह तआ़ला से दुआ़ कीजिए कि वह आपके दिल को नफरत, द्वेष, हसद और तमाम अंदरूनी बीमारियों से पाक फरमा दे।
9. अपनी ज़बान और हाथ को दूसरों को नुक़सान पहुँचाने से बचाइए:
अगर दिल में हसद का एहसास पैदा भी हो जाए तो उसे ग़ीबत, झूठे आरोप, मज़ाक उड़ाने, साज़िश और दूसरों के हक़ मारने का रूप न लेने दीजिए।
किसी के खिलाफ ग़लत बातें फैलाने, उसकी इज़्ज़त को नुक़सान पहुँचाने या उसके काम में रुकावट डालने से अपने आपको सख्ती से रोकिए।
दिल की इस्लाह के साथ-साथ अपने बाहरी कामों और व्यवहार की हिफाज़त करना भी ज़रूरी है।
हसद की गंभीरता:
हसद की तबाही के बारे में एक रिवायत सुनन अबू दाऊद में भी बयान हुई है:
«إِيَّاكُمْ وَالْحَسَدَ، فَإِنَّ الْحَسَدَ يَأْكُلُ الْحَسَنَاتِ كَمَا تَأْكُلُ النَّارُ الْحَطَبَ»
(सुनन अबू दाऊद, किताबुल अदब, बाबुल-हसद)
अनुवाद: हसद से बचो, क्योंकि हसद नेकियों को उसी तरह खा जाता है, जैसे आग लकड़ी को खा जाती है।
यह हदीस हसद की गंभीरता और उसके आध्यात्मिक नुक़सान को एक बहुत प्रभावशाली उदाहरण के ज़रिए समझाती है।
जिस तरह आग लकड़ी को जलाकर राख कर देती है, उसी तरह हसद इंसान की नेकियों और नैतिक खूबियों को बर्बाद करने का कारण बनता है।
एक व्यावहारिक अभ्यास: सात दिनों का आत्म-मूल्यांकन:
हसद से छुटकारा केवल नसीहतें सुनने से नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण और लगातार आत्म-मूल्यांकन ज़रूरी है।
हर इंसान अपने लिए रोज़ाना कुछ मिनट निकालकर निम्नलिखित अभ्यास कर सकता है:
1. रोज़ाना कम से कम अपनी तीन नेअ़मतों को याद करके अल्लाह तआ़ला का शुक्र अदा कीजिए।
2. किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भलाई और बरकत की दुआ़ कीजिए, जिसकी कामयाबी आपको अच्छी नहीं लगती।
3. रोज़ाना कम से कम एक व्यक्ति की किसी सच्ची खूबी को स्वीकार कीजिए।
4. दूसरों से बेवजह अपनी तुलना करने से बचिए।
5. अपनी तरक़्क़ी के लिए रोज़ाना एक छोटा-सा व्यावहारिक क़दम ज़रूर उठाइए।
6. रात को सोने से पहले अपना हिसाब कीजिए कि आज किसी की खुशी देखकर आपका दिल खुश हुआ या आपके अंदर जलन पैदा हुई?
7. अगर आपने किसी के साथ ज़्यादती की हो, उसकी ग़ीबत की हो या उसका हक़ मारा हो तो तौबा कीजिए और जहाँ संभव हो उसकी भरपाई कीजिए।
इस छोटे-से अभ्यास को लगातार जारी रखने से इंसान अपने जज़्बात, व्यवहार और अंदरूनी भावनाओं पर क़ाबू पाने की ट्रेनिंग हासिल कर सकता है।
हालाँकि इसे पूरा इलाज समझने के बजाय सुधार की एक शुरुआ़ती और व्यावहारिक कोशिश समझना चाहिए।
समाज के जागरूक लोगों की ज़िम्मेदारी:
हसद का इलाज केवल व्यक्तिगत सुधार तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि घर, परिवार, शिक्षण संस्थानों, धार्मिक केंद्रों और सामाजिक समूहों में भी इसके खात्मे की कोशिश होनी चाहिए।
माता-पिता बच्चों को एक-दूसरे से बेवजह मुक़ाबला करने और तुलना करने के बजाय आपसी मोहब्बत, सहयोग और हौसला-अफज़ाई की शिक्षा दें।
शिक्षक विद्यार्थियों में अच्छी प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करें, लेकिन किसी एक विद्यार्थी की कामयाबी को दूसरे के लिए हीन भावना और नफरत का कारण न बनने दें।
इल्मी और दीनी क्षेत्रों में एक-दूसरे की सेवाओं को स्वीकार किया जाए, उ़ल्मा की इज़्ज़त की जाए और विचारों के मतभेद को व्यक्तिगत दुश्मनी में न बदला जाए।
इसी तरह सामाजिक और संगठनात्मक जीवन में भी यह सिद्धांत अपनाया जाए कि किसी दूसरे की तरक़्क़ी को अपनी हार न समझा जाए।
अगर अल्लाह तआ़ला ने किसी व्यक्ति को किसी क्षेत्र में आगे बढ़ने की योग्यता दी है तो उसकी हौसला-अफज़ाई की जाए, उसके अनुभवों से फायदा उठाया जाए और सामूहिक तरक़्क़ी के लिए आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
याद रखिए! किसी एक व्यक्ति की कामयाबी पूरे समाज की नाकामी नहीं होती, बल्कि सकारात्मक सोच रखने वाला समाज अपने हर कामयाब व्यक्ति को अपनी सामूहिक ताक़त का हिस्सा समझता है।
कुछ पल अपने दिल से सवाल कीजिए!
क्या कभी आपने किसी को कामयाब होते देखकर अपने दिल में बेचैनी महसूस की है?
क्या कभी किसी की तारीफ सुनकर आपका दिल परेशान हुआ है?
क्या कभी आपने किसी की तरक़्क़ी को केवल इत्तेफाक़, सिफारिश या क़िस्मत का नतीजा बताकर उसकी मेहनत को नज़रअंदाज किया है?
क्या कभी किसी की इज़्ज़त कम करने के लिए उसकी कमज़ोरियों को दूसरों के सामने बयान किया है?
क्या कभी आपने यह इच्छा की है कि फलाँ व्यक्ति की यह नेअ़मत खत्म हो जाए, ताकि वह आपके बराबर या आपसे नीचे आ जाए?
अगर इनमें से किसी सवाल का जवाब हाँ में है तो दूसरों को बदलने से पहले अपने दिल की इस्लाह कीजिए।
क्योंकि हसद का सबसे बड़ा नुक़सान यह है कि इंसान दूसरों के पतन की चिंता में अपनी इस्लाह और अपनी आखिरत से ग़ाफिल हो जाता है।
यह भी याद रखिए कि हसद का इलाज यह नहीं है कि आप अपनी योग्यताएँ छिपा लें, अपनी कामयाबियाँ छोड़ दें या दूसरों की नाराज़गी के डर से अपनी जायज़ खुशियों को सीमित कर लें।
बल्कि असल इलाज यह है कि जिस व्यक्ति को नेअ़मत मिली है, वह उस पर शुक्र अदा करे और उसे अल्लाह तआ़ला की रजा़ के अनुसार इस्तेमाल करे, जबकि हसद करने वाला अपने दिल को हसद से पाक करने की कोशिश करे।
दूसरों के चिराग़ बुझाने के बजाय अपना चिराग़ रोशन कीजिए!
ज़िंदगी बहुत छोटी है। इसे दूसरों की कामयाबियों से जलने, उनकी नेअ़मतें खत्म होने की इच्छा करने और उनके ऐब तलाश करने में बर्बाद कर देना समझदारी नहीं है।
इंसान को चाहिए कि वह अपनी योग्यताओं को पहचाने, अपने समय की क़द्र करे, अपने उद्देश्य तय करे और अपनी ज़िंदगी को अच्छे और रचनात्मक कामों में लगाए।
दुनिया में हर इंसान का अपना स्थान, अपनी योग्यता, अपनी ज़िम्मेदारी और अपना कार्यक्षेत्र है।
अल्लाह तआ़ला ने किसी को इल्म की दौलत दी है तो किसी को अच्छे अखलाक़ की खूबी अ़ता फरमाई है। किसी को माल दिया है तो किसी को इंसानियत की सेवा का जज़्बा दिया है। किसी को शोहरत मिली है तो किसी को गुमनामी में रहकर बड़े-बड़े अच्छे काम करने की तौफीक़ नसीब हुई है।
इसलिए किसी दूसरे की नेअ़मत देखकर परेशान होने के बजाय अपने हिस्से की नेअ़मत को पहचानिए और उसे बेहतरीन तरीक़े से इस्तेमाल कीजिए।
हसद करने वाला समझता है कि वह दूसरे की खुशियों से जलकर उससे बदला ले रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि वह अपने ही सुकून को बर्बाद कर रहा होता है।
वह दूसरे की इज़्ज़त कम करने की कोशिश करता है, लेकिन अपना चरित्र गिरा लेता है। वह दूसरे की तरक़्क़ी रोकना चाहता है, लेकिन अपनी तरक़्क़ी के रास्ते खुद बंद कर लेता है।
इसके विपरीत ऊँचे विचारों वाला इंसान दूसरों की कामयाबी पर खुश होता है, उनकी खूबियों को स्वीकार करता है, उनके लिए भलाई की दुआ़ करता है और अपनी ज़िंदगी को अच्छे उद्देश्यों के लिए समर्पित रखता है।
हमें यह सच्चाई हमेशा याद रखनी चाहिए कि अल्लाह तआ़ला की नेअ़मतें बाँटने से कम नहीं होतीं, बल्कि उसका फज़्ल और करम बहुत व्यापक है।
किसी दूसरे को मिली हुई नेअ़मत हमारे लिए महरूमी की निशानी नहीं है, बल्कि यह उम्मीद भी हो सकती है कि वही रब हमें भी अपने फज़्ल से नवाज सकता है।
इसलिए आइए! अपने दिलों को हसद, नफरत, द्वेष और दुश्मनी से पाक करें। एक-दूसरे की कामयाबियों पर खुश होना सीखें, एक-दूसरे के लिए दुआ़एँ करें, खूबियों को स्वीकार करें और अपनी योग्यताओं को निखारने में अपनी ताक़त लगाएँ।
क्योंकि दूसरों के चिराग़ बुझाने से हमारी ज़िंदगी रोशन नहीं होती, बल्कि ज़िंदगी उस समय रोशन होती है, जब हम अपने अंदर मेहनत, ईमानदारी, मोहब्बत, भलाई चाहने और इंसानियत की सेवा का चिराग़ जलाते हैं।
अल्लाह तआ़ला हमें पाकीज़ा दिल, साफ नीयत, बड़ा दिल, भलाई चाहने का जज़्बा और हसद व द्वेष से सुरक्षित रहने वाली ज़िंदगी अ़ता फरमाए।
आमीन, बिजाहि सय्यिदिल मुर्सलीन ﷺ।
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