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मदरसे बचाने हैं तो मदरसों का निज़ाम बदलना होगा

📅 03-11-2026 10:13 PM 👁 54 Readers 💬 0 Comments 🔁 2 Shares
लेख / विचार

आख़िर कब तक चंदे पर चंदा जमा होगा और हमारे तलबा अपने बुनियादी अधिकारों एवं भविष्य के लिए तरसते रहेंगे?

एक सवाल उन तमाम मदरसा संचालकों, जामिया के ज़िम्मेदारों और दारुल उलूम के सरपरस्तों से, जो क़ौम के बच्चों के मुस्तक़बिल, उनकी ताअ़लीम और जनता की अमानत के संरक्षक होने का दावा करते हैं। मदरसे हमारी धार्मिक, शैक्षिक और तहज़ीबी विरासत हैं। इन्हीं संस्थानों से उलमा, हुफ़्फ़ाज़, क़ुर्रा और मुफ़्तियान-ए-किराम तैयार होते हैं। इनकी अहमियत से इनकार करना, न हमारी मंशा है और न हमारा मक़सद लेकिन एक बात समझना ज़रूरी है। किसी संस्था का धार्मिक नाम बड़ा होने से उसकी हर व्यवस्था अपने आप बेहतर नहीं हो जाती। उसके वास्तविक मयार का पता वहां की ताअ़लीम, इंतज़ाम, तलबा की हालत, शिक्षकों की गरिमा और आर्थिक पारदर्शिता से चलता है। मैंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में मदरसों, जामियाओं और दारुल उलूम का दौरा किया है। कई जगह ऐसे हालात देखने को मिले, जिन्होंने मुझे गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया। ये सवाल किसी एक संस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के सामने हैं जिसे हम अपनी आने वाली नस्लों के हवाले कर रहे हैं। आज सवाल पूछना ज़रूरी है क्योंकि जहां सवाल पूछना बंद हो जाता है, वहां सुधार के रास्ते भी बंद होने लगते हैं।

1. क्या हमारे मदरसों में तलबा को शिक्षा मिल रही है या केवल रहने की जगह?

कई स्थानों पर एक ही कमरे में, क्षमता से अधिक बच्चों को रखा जाता है। कहीं कमरों की सफ़ाई, संतोषजनक नहीं, कहीं शौचालयों की हालत चिंताजनक, कहीं पीने के साफ़ पानी और पौष्टिक भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं। कुछ जगह बच्चों में खुजली, दाद और त्वचा संबंधी संक्रमण जैसी समस्याएं भी देखने को मिलीं। ज़रा सोचिए! जिन बच्चों को हम अपना भविष्य कहते हैं, क्या उनके लिए साफ़ बिस्तर, स्वच्छ वातावरण, पर्याप्त भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना हमारी पहली ज़िम्मेदारी नहीं???
हर मदरसे से पूछा जाना चाहिए...
कितने तलबा के लिए कितने कमरे उपलब्ध हैं? एक कमरे में कितने बच्चों को रखा जाता है? भोजन की गुणवत्ता और पौष्टिकता कौन जांचता है? पीने के साफ़ पानी की व्यवस्था कैसी है? शौचालयों और स्नानगृहों की नियमित सफ़ाई कौन सुनिश्चित करता है? बीमार होने पर बच्चों के इलाज की क्या व्यवस्था है? क्या नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता है? तलबा कोई संख्या नहीं हैं, जिन्हें रजिस्टर में दर्ज करके ज़िम्मेदारी पूरी समझ ली जाए। वे इंसान हैं, अमानत हैं और अपने मां बाप और क़ौम की उम्मीद हैं।

2. उस्ताद की इज़्ज़त और पारिवारिक जीवन की ज़िम्मेदारी किसकी है?

जो शिक्षक अपना जीवन ताअ़लीमे दीन के लिए समर्पित कर देते हैं, क्या उन्हें उचित वेतन, सम्मानजनक आवास और बुनियादी सुविधाएं मिलती हैं? क्या उनके परिवार की आवश्यकताओं को समझा जाता है? क्या उनके लिए ऐसा वातावरण है, जहां वे मानसिक सुकून और सम्मान के साथ अपनी सेवाएं दे सकें? कई संस्थानों में शिक्षकों की आर्थिक और आवासीय स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है। इसके साथ एक और अत्यंत संवेदनशील विषय है तलबा की सुरक्षा। यदि किसी शिक्षक, कर्मचारी या प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति के विरुद्ध यौन उत्पीड़न, शोषण अथवा बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत आती है, तो संस्था की जांच व्यवस्था क्या है? क्या शिकायतकर्ता को सुरक्षित वातावरण मिलता है? क्या निष्पक्ष जांच होती है? क्या बच्चों की सुरक्षा को संस्था की प्रतिष्ठा से ऊपर रखा जाता है? यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी आरोप को बिना जांच सच नहीं माना जा सकता लेकिन किसी शिकायत को संस्था की बदनामी के डर से दबा देना भी, किसी तरह उचित नहीं। हर मदरसे में बाल-सुरक्षा नीति, शिकायत समिति, गोपनीय शिकायत व्यवस्था और निष्पक्ष जांच का प्रबंध होना चाहिए। इल्म पढ़ाने वाला व्यक्ति केवल अपने विषय का जानकार न हो, बल्कि उसके किरदार, व्यवहार और बच्चों के प्रति ज़िम्मेदारी की भी जांच होनी चाहिए।

3. क्या मदरसे और जामिया पारिवारिक विरासत बनते जा रहे हैं?

यह सवाल भी अब खुलकर पूछा जाना चाहिए। किसी संस्था का संचालन योग्यता, ईमानदारी और प्रशासनिक क्षमता के आधार पर होना चाहिए या केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर? संस्थापक के बाद बेटा, बेटे के बाद पोता और फिर अगली पीढ़ी। क्या यही किसी ताअ़लीमी संस्था के संचालन का आदर्श तरीक़ा है? यदि बेटा या पोता योग्य है तो उसे ज़िम्मेदारी मिलने में कोई आपत्ति नहीं। लेकिन केवल वंशज होने के आधार पर किसी को संस्था की स्थायी सत्ता सौंप देना किस तरह उचित ठहराया जा सकता है? संस्था का लिखित संविधान कहां है? प्रबंधन समिति का गठन किस प्रक्रिया से होता है? पदाधिकारियों की योग्यता और कार्यकाल क्या है? नियुक्तियों में पारदर्शिता है या नहीं? संस्था का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करता है? क्या योग्य और अनुभवी लोगों को प्रबंधन में स्थान मिलता है? मदरसा किसी की निजी जागीर नहीं, बल्कि क़ौम की अमानत है। किसी संस्थापक की सेवाएं, सम्मान के योग्य हो सकती हैं लेकिन संस्था का भविष्य केवल एक परिवार की इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

4. चंदा, ज़कात और सदक़ात, आख़िर हिसाब कौन देगा?

साल-दर-साल अपीलें होती हैं। ले चंदा, दे चंदा! ले ज़कात, दे ज़कात! ले सदक़ा, दे सदक़ा। क़ौम अपनी मेहनत की कमाई से मदरसों को सहयोग करती है। कोई अपनी तनख़्वाह से देता है, कोई अपनी दुकान की कमाई से, कोई अपनी जमा पूंजी से और कोई अपनी ज़रूरतें कम करके बच्चों की ताअ़लीम के लिए मदद करता है। यह सहयोग एक नेक काम है लेकिन क्या दान देने वालों को यह जानने का अधिकार नहीं कि उनकी दी हुई रक़म कहां ख़र्च हुई? पिछले वर्ष कितना चंदा प्राप्त हुआ? ज़कात और सदक़ात की रक़म का अलग-अलग हिसाब क्या है? शिक्षकों के वेतन पर कितना ख़र्च हुआ? तलबा के भोजन, आवास और इलाज पर कितना ख़र्च हुआ? भवन निर्माण और अन्य संपत्तियों पर कितना ख़र्च हुआ? क्या हर वर्ष स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है? क्या वार्षिक आय-व्यय रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती है? सवाल चंदा लेने पर नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही पर है।
और एक सुझाव पर भी विचार होना चाहिए...
क्या बड़े मदरसे केवल लगातार चंदे पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क़ानूनी हैसियत, ट्रस्ट डीड, वक़्फ़ के नियमों और शरई सीमाओं के अनुरूप स्थायी आय के साधन विकसित नहीं कर सकते? मसलन किराये की संपत्ति, कृषि, वैध व्यवसाय या कौशल प्रशिक्षण केंद्र। क़ौम की अमानत को केवल ख़र्च करने का नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने और भविष्य के लिए आर्थिक रूप से मज़बूत बनाने का भी इंतज़ाम होना चाहिए।

5. सबसे बड़ा सवाल, क्या हमारे आलिम और फ़ाज़िल की डिग्रियां मान्यता प्राप्त हैं?

अब इस मुद्दे को बहुत ध्यान से पढ़िए, क्योंकि यह हमारे हज़ारों नौजवानों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। एक बच्चा वर्षों तक मदरसे में पढ़ता है। नाज़िरा, हिफ़्ज़, आलिम, फ़ाज़िल और फिर उच्च धार्मिक शिक्षा हासिल करता है। उसके मां बाप उम्मीद करते हैं कि उनका बेटा इल्म हासिल करके सम्मानजनक जीवन व्यतीत करेगा लेकिन जब वही नौजवान उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय या सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है, तब उसके सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो जाता है जिसका जवाब हर मदरसा संचालक को देना चाहिए। क्या आपके मदरसे की डिग्री किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से संबद्ध है? क्या आपके यहां से जारी होने वाली आलिम, फ़ाज़िल या अन्य डिग्रियों को संबंधित विश्वविद्यालय अथवा सक्षम शैक्षिक प्राधिकरण की मान्यता प्राप्त है? या फिर वर्षों की पढ़ाई पूरी करने के बाद आपके फ़ारिग़ीन को आवेदन के समय यह सुनना पड़ता है...
“NOT RECOGNISED BY ANY UNIVERSITY”
ज़रा इस वाक्य की गंभीरता महसूस कीजिए। यह केवल अंग्रेज़ी के चार शब्द नहीं हैं। यह उस नौजवान के सामने खड़ी एक बड़ी शैक्षिक बाधा का संकेत हो सकता है, जिसने अपनी ज़िंदगी के कई वर्ष एक विशेष पाठ्यक्रम में लगाए हैं। मैंने ऐसे मामलों में आवेदन के संबंध में यह टिप्पणी देखी है। इसलिए यह सवाल केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभव से जुड़ा हुआ है।

अब मदरसा संचालकों से सीधे सवाल हैं...

1. आपके मदरसे की डिग्री किस मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से संबद्ध है? 2. यदि संबद्धता नहीं है तो उसके लिए अब तक क्या प्रयास किए गए? 3. आपके यहां से फ़ारिग़ होने वाले आलिम और फ़ाज़िल उच्च शिक्षा में किस आधार पर प्रवेश ले सकते हैं? 4. क्या आपकी डिग्री की समकक्षता (Equivalence) किसी सक्षम प्राधिकरण से प्रमाणित है? 5. क्या आपके फ़ारिग़ीन सरकारी नौकरियों के निर्धारित शैक्षिक मानदंडों को पूरा कर पाते हैं? 6. क्या आपने अपने तलबा को इस विषय में दाख़िले के समय ही वास्तविक स्थिति बताई है?
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए, हर मदरसे की हर डिग्री अमान्य है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। मान्यता और समकक्षता संबंधित विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, प्राधिकरण और भर्ती के नियमों पर निर्भर करती है लेकिन यदि किसी संस्था की डिग्री को मान्यता प्राप्त नहीं है, तो क्या उस संस्था की ज़िम्मेदारी नहीं कि वह अपने तलबा को पहले दिन से इसकी जानकारी दे और मान्यता, संबद्धता तथा उच्च शिक्षा के रास्ते विकसित करने के लिए गंभीर प्रयास करे? क्या हम ऐसे नौजवान तैयार करेंगे जो धार्मिक शिक्षा में वर्षों लगा दें, लेकिन जब रोज़गार और उच्च शिक्षा का दरवाज़ा खटखटाएं तो उन्हें अपनी डिग्री की मान्यता साबित करने के लिए भटकना पड़े? हमें ऐसे आलिम चाहिए जिनके पास दीन का इल्म भी हो और उनके लिए उच्च शिक्षा तथा सम्मानजनक रोज़गार के रास्ते भी खुले हों।

6. क्या ताअ़लीम का मयार केवल सालाना जलसों और दस्तारबंदी से तय होगा?

हर साल जलसे होते हैं। दस्तारबंदियां होती हैं। बड़े-बड़े मंच सजते हैं। उलमा और मशाइख़ की तक़रीरें होती हैं। फ़ारिग़ीन को सम्मानित किया जाता है। यह सब अपनी जगह महत्वपूर्ण है लेकिन क्या कभी यह भी जांचा जाता है कि इन वर्षों में तलबा ने वास्तव में कितना सीखा? क्या उनकी अरबी भाषा पर पकड़ है? क्या वे सही ढंग से लिख और बोल सकते हैं? क्या उन्हें फ़िक़्ह, हदीस, तफ़सीर और उसूल की गहरी समझ है? क्या वे आधुनिक दौर के सवालों का इल्मी जवाब देने की क्षमता रखते हैं? क्या शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम हैं? क्या पाठ्यक्रम की समय-समय पर समीक्षा होती है? क्या शोध, लेखन और व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा दिया जाता है? हिंदी, अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान, कंप्यूटर और तकनीकी शिक्षा को भी उचित स्थान मिलना चाहिए। हमारी मंशा दीन की ताअ़लीम को कम करना नहीं, बल्कि दीन की ताअ़लीम को और अधिक प्रभावशाली बनाना है।

7. अब हर मदरसे से ये सवाल पूछे जाने चाहिए

हमारी यह आवाज़ केवल सोशल मीडिया की पोस्ट बनकर न रह जाए। हर ज़िले, हर शहर और हर क़स्बे में लोगों को अपने संस्थानों की वास्तविक स्थिति जानने का अधिकार और हौसला होना चाहिए।

अभिभावक पूछें...
मेरे बच्चे के रहने, खाने और स्वास्थ्य की क्या व्यवस्था है? उसे पढ़ाने वाले शिक्षक कितने योग्य हैं? उसकी शिक्षा पूरी होने के बाद उसका भविष्य क्या होगा?

दानदाता पूछें...
मेरी दी हुई रक़म का हिसाब कहां है? संस्था की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट कहां उपलब्ध है? तलबा और शिक्षकों पर कितना ख़र्च किया जाता है?

नौजवान पूछें...
मेरी डिग्री की मान्यता क्या है? उच्च शिक्षा के लिए मेरे पास कौन-कौन से रास्ते हैं? क्या मुझे आधुनिक विषयों और रोज़गार के लिए भी तैयार किया जा रहा है?

और मदरसा संचालक स्वयं से पूछें...
क्या हमारी संस्था में पारदर्शिता है? क्या हम अपनी कमियों को स्वीकार करते हैं? क्या हम सुधार के लिए तैयार हैं? क्या हमारी प्राथमिकता संस्था की प्रतिष्ठा है या तलबा का भविष्य?

8. अब सुधार की एक ठोस रूपरेखा बननी चाहिए

हम केवल सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि समाधान भी चाहते हैं। हर मदरसे, जामिया और दारुल उलूम में...
1. लिखित संविधान और पारदर्शी प्रबंधन व्यवस्था हो। 2. पदाधिकारियों का कार्यकाल और ज़िम्मेदारियां निर्धारित हों। 3. वार्षिक आय-व्यय रिपोर्ट और स्वतंत्र ऑडिट हो। 4. शिक्षकों की योग्यता, वेतन और सुविधाओं का उचित प्रबंध हो। 5. तलबा के लिए स्वच्छ आवास, पौष्टिक भोजन और चिकित्सा सुविधा हो। 6. बाल-सुरक्षा और शिकायतों की निष्पक्ष जांच का तंत्र हो। 7. धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों की गुणवत्ता बढ़ाई जाए। 8. डिग्रियों की मान्यता और समकक्षता के लिए ठोस प्रयास हों। 9. शोध, लेखन, भाषा और तकनीकी कौशल को प्रोत्साहित किया जाए। 10. संस्था की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए दीर्घकालीन योजना बने।

अब आख़िरी सवाल, क्या हम अपनी आने वाली नस्लों के भविष्य पर सवाल उठाने का साहस करेंगे?

मैं तमाम उलमा-ए-किराम, मशाइख़-ए-उज़ाम, मदरसा संचालकों, अभिभावकों, दानदाताओं और क़ौम के जागरूक नौजवानों से अपील करता हूं... इस आवाज़ को किसी की दुश्मनी न समझें। इसे अपने संस्थानों के सुधार का अवसर समझें। यदि किसी मदरसे की व्यवस्था अच्छी है तो उसे अपना रिकॉर्ड और पारदर्शिता सामने रखनी चाहिए। यदि कहीं कमी है तो उसे स्वीकार करके सुधारना चाहिए। मदरसे हमारी विरासत हैं लेकिन विरासत का अर्थ यह नहीं कि हम हर पुरानी व्यवस्था को बिना जांचे स्वीकार करते रहें। हमें ऐसे मदरसे चाहिए जहां तलबा को इल्म के साथ इज़्ज़त मिले, उस्ताद को ताअ़लीम के साथ सम्मान मिले, दानदाता को भरोसे के साथ हिसाब मिले और फ़ारिग़ीन को डिग्री के साथ भविष्य भी मिले। हमें ऐसे जामिया चाहिए जिनकी पहचान केवल बड़ी इमारतों, बड़े नामों और बड़े जलसों से नहीं, बल्कि उच्च शैक्षिक मयार, बेहतरीन प्रशासन और उत्कृष्ट फ़ारिग़ीन से हो और हमें ऐसे दारुल उलूम चाहिए जो अपनी धार्मिक विरासत को संभालते हुए समय के शैक्षिक और सामाजिक सवालों का सामना करने की क्षमता भी रखते हों।

अब वक़्त आ गया है कि मदरसों में केवल तलबा का इम्तिहान न हो, बल्कि इंतज़ाम चलाने वालों की जवाबदेही का भी इम्तिहान हो‌क्योंकि सवाल उठाना बग़ावत नहीं, अमानत की हिफ़ाज़त है। मदरसे में इल्म की बुलंदी, इंतज़ाम में पारदर्शिता, तलबा की सुरक्षा, उस्ताद की गरिमा और हर अमानत का हिसाब। यही हमारी इस्लाही तहरीक का मक़सद है। अब ताअ़रीफ़ के साथ सवाल भी होंगे और सवालों के जवाब केवल तक़रीरों से नहीं, बल्कि वास्तविक सुधार से देने होंगे।

— सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी —
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन | जयपुर | 93586 49187

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