मस्जिदों का निज़ाम बदलिए
इमामत का मयार बुलंद कीजिए, कमेटियों की जवाबदेही तय कीजिए
अब ख़ामोशी नहीं, सवाल उठाने का वक़्त है! अब शख़्सियतों की नहीं, निज़ाम की इस्लाह का वक़्त है
आज मस्जिदों की बदहाली के लिए, सिर्फ़ इमाम ज़िम्मेदार नहीं हैं और न ही सारी ज़िम्मेदारी कमेटियों पर डालकर बचा जा सकता है। हक़ीक़त यह है कि अनेक स्थानों पर इमामत का मयार और मस्जिदों के इंतिज़ामी ढांचे, दोनों गंभीर इस्लाह के मुंतज़िर हैं। एक तरफ़ इमामत जैसी अज़ीम मज़हबी ज़िम्मेदारी के लिए इल्मी अहलियत और क़ाबिलियत का मयार गिरता दिखाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ़ मस्जिदों की कमेटियों का गठन, उनका रवैया और उनकी जवाबदेही भी गंभीर सवालों के घेरे में है। आख़िर मस्जिदों के इस्लामी मयार और इंतिज़ामी निज़ाम की फ़िक्र किसे है?
इमामत का मयार और इमाम की जवाबदेही
आज कई जगह न इमाम की तजवीद दुरुस्त है, न क़िराअत का मयार संतोषजनक, न ज़रूरी शरई मसाइल पर पर्याप्त पकड़ और न ही जुमा व ईदैन के ख़ुत्बों की अदायगी में अपेक्षित इल्मी तैयारी। इसके बावजूद इमाम की नियुक्ति और उसकी योग्यता की जांच का कोई प्रभावी निज़ाम नज़र नहीं आता। कहीं-कहीं इमाम की इल्मी क़ाबिलियत से ज़्यादा उसकी जी-हुज़ूरी, चापलूसी और ख़ुशामद को अहमियत दी जाती है। जो कमेटी की हर बात पर हाँ में हाँ मिलाए, सवाल न उठाए, हक़ बात कहने से परहेज़ करे और अपनी नौकरी बचाने के लिए हर जायज़-नाजायज़ फ़रमाइश के आगे, सर झुका दे, उसके लिए रास्ते आसान हो जाते हैं। जबकि क़ौम को ऐसे इमामों की ज़रूरत है, जो इल्म व अमल के पैकर हों, तजवीद के साथ नमाज़ पढ़ाएं, नमाज़, ख़ुत्बे, तक़रीर और दुआओं में अल्फ़ाज़ की अदायगी का पूरा ख़याल रखें, हक़गोई की हिम्मत रखते हों और क़ौम को नये-नये फ़ित्नों, फ़िक्री गुमराहियों तथा सामाजिक बुराइयों से आगाह करके, उसकी इस्लाही व फ़िक्री रहनुमाई कर सकें। इमाम का काम केवल नमाज़ पढ़ाना नहीं, बल्कि इल्म, हिकमत और ख़ैरख़्वाही के साथ क़ौम की रहनुमाई करना भी है। इमाम को कमेटी का ख़ुशामदी मुलाज़िम नहीं, बल्कि मस्जिद का अमीन और दीन का ज़िम्मेदार रहनुमा होना चाहिए।
अब मस्जिद कमेटियों की जवाबदेही पर भी बात हो
आख़िर मस्जिद कमेटी का मेम्बर बनने का कोई निर्धारित पैमाना क्यों नहीं है? कौन मेम्बर बनेगा, उसकी पात्रता क्या होगी, उसकी ज़िम्मेदारी क्या होगी, कार्यकाल कितना होगा और उसका चुनाव किस प्रक्रिया के तहत होगा? कई जगह कोई भी व्यक्ति कमेटी में शामिल हो जाता है और फिर मस्जिद को अपनी निजी जागीर समझकर व्यवहार करने लगता है। कुछ स्थानों पर सदस्यों के मज़हबी आचरण, ईमानदारी, अख़लाक़ और सामाजिक ज़िम्मेदारी तक पर गंभीर सवाल उठते हैं। मस्जिद के इंतिज़ाम की ज़िम्मेदारी ऐसे लोगों के हाथों में होनी चाहिए जो अमानतदार, ईमानदार, जवाबदेह, शरीफ़ुल-अख़लाक़ और इंतिज़ामी सलाहियत रखते हों। मस्जिद कमेटी किसी की जागीर नहीं और न ही सदर सिक्रेट्री या खजांची का पद किसी की ख़ानदानी विरासत है।
मस्जिद कमेटियों का चुनाव भी लोकतांत्रिक तरीक़े से हो
मेरा स्पष्ट और पुरज़ोर सुझाव है कि मस्जिद कमेटियों का गठन भी पार्षद और विधायक के चुनाव की तरह, बाक़ायदा लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। जिस तरह आम चुनावों में मतदाता सूची, उम्मीदवारों की पात्रता, नामांकन, मतदान, मतगणना, चुनाव परिणाम और निश्चित कार्यकाल की व्यवस्था होती है, उसी तरह मस्जिद कमेटियों के लिए भी स्पष्ट, लिखित, पारदर्शी और सर्वमान्य नियम बनाए जाने चाहिए।
मसलन:
1. मस्जिद के वास्तविक सदस्यों और मतदाताओं की बाक़ायदा सूची तैयार हो।
2. कमेटी के चुनाव निर्धारित समय पर निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रक्रिया से हों।
3. उम्मीदवारों के लिए दीनदारी, ईमानदारी, अच्छे अख़लाक़, अमानतदारी और सामाजिक ज़िम्मेदारी के स्पष्ट मानदंड हों।
4. कमेटी का कार्यकाल निश्चित हो और समय पर चुनाव कराना अनिवार्य हो।
5. मस्जिद की आमदनी और ख़र्च का वार्षिक ऑडिट हो तथा हिसाब-किताब सार्वजनिक किया जाए।
6. इमाम की नियुक्ति तजवीद, क़िराअत, इल्मी योग्यता और ज़रूरी शरई मसाइल की बाक़ायदा जांच के बाद हो। इस काम के लिए अपने इलाक़े के आलिमों से मदद ली जाए। जाहिलों से नहीं।
7. इमाम को मज़हबी मामलों में उचित आज़ादी मिले और कमेटी की मनमानी से उसकी गरिमा प्रभावित न हो।
8. इमाम और कमेटी, दोनों के लिए जवाबदेही तथा निष्पक्ष शिकायत निवारण की व्यवस्था हो।
अब सवाल उठाना ज़रूरी है
आख़िर कब तक मस्जिदों का इंतिज़ाम व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, रिश्तेदारी, गुटबाज़ी और मनमानी की भेंट चढ़ता रहेगा? आख़िर कब तक इमाम की इल्मी योग्यता के बजाय उसकी वफ़ादारी और जी-हुज़ूरी को तरजीह दी जाती रहेगी? आख़िर कब तक मस्जिदों की कमेटियों में जवाबदेही के बजाय पद, प्रभाव और व्यक्तिगत दबदबे को अहमियत मिलती रहेगी और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मस्जिदें ही इल्म, अमानत, इंसाफ़ और इस्लाही रहनुमाई का मरकज़ नहीं बनेंगी, तो क़ौम को सही दिशा कौन दिखाएगा? याद रखिए! मस्जिद अल्लाह का घर है। उसका इमाम हो या इंतिज़ाम संभालने वाली कमेटी, दोनों अल्लाह के सामने अपनी ज़िम्मेदारियों के जवाबदेह हैं। हमारा मक़सद किसी इमाम की रोज़ी छीनना, किसी की तौहीन करना या किसी कमेटी को निशाना बनाना नहीं है। हमारा मक़सद उस निज़ाम की इस्लाह है जिसमें कहीं क़ाबिलियत की क़द्र नहीं, कहीं अमानतदारी की अहमियत नहीं और कहीं जवाबदेही का एहसास तक नहीं।
हमें इमाम बदलने से पहले, इमामत का मयार बुलंद करना होगा और कमेटी बदलने से पहले, कमेटी के गठन का निज़ाम दुरुस्त करना होगा
अब चापलूसी नहीं, क़ाबिलियत का मयार तय होना चाहिए। अब मनमानी नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था होनी चाहिए। अब व्यक्तिगत दबदबा नहीं, अमानतदारी और जवाबदेही होनी चाहिए। अब ख़ामोशी नहीं, हक़गोई होनी चाहिए।
हर मस्जिद में इस्लाही बेदारी की ज़रूरत है
यह किसी एक शहर का मसला नहीं, बल्कि मस्जिदों के मज़हबी और इंतिज़ामी निज़ाम से जुड़ा एक व्यापक सुधारवादी विषय है। उलमा-ए-किराम, मशाइख़-ए-उज़ाम, मुफ़्तियान-ए-किराम, इमामों, सामाजिक रहनुमाओं और जागरूक अहल-ए-मिल्लत को इस विषय पर संजीदगी से आगे आना चाहिए। मस्जिदें आबाद हों, मगर केवल इमारतों से नहीं; इल्म, अमल, अख़लाक़, इंसाफ़ और अमानतदारी से भी आबाद हों। वक़्त आ गया है कि मस्जिदों के इमाम और कमेटियों, दोनों के लिए एक मुकम्मल, व्यवस्थित और अमली इस्लाही आंदोलन शुरू किया जाए क्योंकि मस्जिदों का निज़ाम सुधरेगा, इमामत का मयार बुलंद होगा और कमेटियां जवाबदेह बनेंगी, तभी क़ौम की मज़हबी, इल्मी और सामाजिक रहनुमाई का मयार भी बुलंद होगा। बदलाव किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि सोच, व्यवस्था और सामूहिक जवाबदेही से आएगा।
मस्जिदों का निज़ाम बदलिए, इमामत का मयार बुलंद कीजिए और कमेटियों को जवाबदेह बनाइए
अगर आप भी इस इस्लाही सोच से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं तो इस आवाज़ को अपने तक सीमित न रखिए। इसे उलमा, मशाइख़, इमामों और जागरूक क़ौम तक पहुंचाइए। अधिक से अधिक शेयर कीजिए, ताकि इस विषय पर एक गंभीर, सकारात्मक और अमली बहस शुरू हो सके।
ख़ामोशी समस्याओं को मज़बूत करती है और जागरूकता सुधार का रास्ता खोलती है
मस्जिद अल्लाह की, इमामत इल्म की, कमेटी अमानत की और निज़ाम जवाबदेही का
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन | जयपुर | 9358649187
Comments (2)
Muhammad FarmanulQadri11 01 Nov 2026
Beshak lekin aap bhi likh hi rahe ho bas ya kuchh kar bhi rahe ho
صبغت اللہ فیضی 01 Nov 2026
بے شک
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