कोई शाहाना-सा दरबार ज़रूरी तो नहीं
कोई शाहाना-सा दरबार ज़रूरी तो नहीं,
ये जो नज़राना है हर बार ज़रूरी तो नहीं।
मसनद-ए-फ़ख़्र पे बैठे हुए सूफ़ी के लिए,
इस क़दर हाशिया-बरदार ज़रूरी तो नहीं।
क्या ग़रज़ तारिक-ए-दुनिया को भला दुनिया से,
जो भी है आपको दरकार ज़रूरी तो नहीं।
सिर्फ़ इक बार चटाई तो बिछा कर देखो,
कोठियाँ, महल, ये दरबार ज़रूरी तो नहीं।
तालिब-ए-फ़ैज़ जो होगा वो चला आएगा,
आमदो-रफ़्त ये असफ़ार ज़रूरी तो नहीं।
इतनी लाज़िम भी नहीं अपनी अना की तस्कीन,
आगे-पीछे ये अदाकार ज़रूरी तो नहीं।
लाज़िमा ख़ैर का है ख़ुद को छुपा कर रखना,
जितना तुम करते हो इज़हार ज़रूरी तो नहीं।
साहिबो! ख़ाक-नशीनी के मज़े भी लूटो,
इस क़दर जुब्बा-व-दस्तार ज़रूरी तो नहीं।
ढूँढ़ कर ज़ख़्म, नमक उन पे छिड़कते रहना,
दोस्ती ऐसी मेरे यार ज़रूरी तो नहीं।
जान ले दिल की हर एक बात, निगाहें पढ़ ले,
कोई ऐसा भी हो फ़नकार ज़रूरी तो नहीं।
हम तो शहज़ाद बहरहाल मुसाफ़िर ठहरे,
राहगीरों का हो घर-बार ज़रूरी तो नहीं।
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