नाना पाटेकर ने पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, नाती के कान में मदरसे के उस्ताद से दिलवाई अज़ान
जब अज़ान के अल्फ़ाज़ में मिला सुकून: नाना पाटेकर का इंसानियत भरा फैसला
लखनऊ । मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर ने मजहबी तंगनज़री से ऊपर उठकर इंसानियत और गंगा-जमुनी तहजीब की एक बेहतरीन मिसाल पेश की है।
खबरों के मुताबिक, अपने नाती की पैदाइश की खुशी में उन्होंने एक अलग और रूहानी रास्ता चुना। उन्होंने एक मदरसे के शिक्षक को दावत दी और अपने नाती के कान में अज़ान दिलवाई।
इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अज़ान का हिंदी अनुवाद सुना तो उसके मायनों में उन्हें गहरा सुकून और खुदा की अज़मत का एहसास हुआ।
इस मसर्रत के मौके को और खास बनाते हुए नाना पाटेकर ने 120 बच्चों में नए कपड़े तकसीम किए और उनके लिए ज़ियाफत (दावत) का भी इंतज़ाम किया।
जब इस कदम पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए, तो उन्होंने बेबाक लहजे में कहा कि - "मैं अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीता हूँ, किसी की तंग सोच पर नहीं।"
यह वाकया इस बात की गवाही देता है कि जब दिल से तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की दीवारें गिर जाती हैं, तो मजहब सिर्फ इंसान को इंसान से जोड़ने का जरिया बन जाता है।
खबरों के मुताबिक, अपने नाती की पैदाइश की खुशी में उन्होंने एक अलग और रूहानी रास्ता चुना। उन्होंने एक मदरसे के शिक्षक को दावत दी और अपने नाती के कान में अज़ान दिलवाई।
इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अज़ान का हिंदी अनुवाद सुना तो उसके मायनों में उन्हें गहरा सुकून और खुदा की अज़मत का एहसास हुआ।
इस मसर्रत के मौके को और खास बनाते हुए नाना पाटेकर ने 120 बच्चों में नए कपड़े तकसीम किए और उनके लिए ज़ियाफत (दावत) का भी इंतज़ाम किया।
जब इस कदम पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए, तो उन्होंने बेबाक लहजे में कहा कि - "मैं अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीता हूँ, किसी की तंग सोच पर नहीं।"
यह वाकया इस बात की गवाही देता है कि जब दिल से तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की दीवारें गिर जाती हैं, तो मजहब सिर्फ इंसान को इंसान से जोड़ने का जरिया बन जाता है।
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